- Post by कँवल भारती 2017-11-06
भारत में जमीन के सवाल को जितनी अच्छी तरह से दलित चिंतन ने समझा है, उतना शायद ही किसी अन्य वर्ग चिंतन ने समझा हो। इसका कारण भी है। इस देश में जमीन के सवाल ने जितना दलितों को रुलाया है, उतना किसी को भी नहीं रुलाया है। दलितों को उसने खून के आँसू रुलाए हैं। इस जमीन ने दलितों को जिंदा जलाया है। उनके घरों को तबाह किया है। उनकी स्त्रियों को पशुता से रौंदा है और गाँव से पलायन करने पर मजबूर किया है। इसलिए दलित चिंतन में जमीन के सवाल सबसे प्रखर हैं।
दलित चिंतन में जमीन के सवाल को लेकर सबसे पहली आवाज पंद्रहवीं शताब्दी में कबीर ने उठाई थी। उन्होंने जमींदारों के अत्याचार, लगान की मार, किसानों की गरीबी और गाँव से उनके पलायन का सजीव और मार्मिक वर्णन अपने पदों में किया है। उन्नीसवीं सदी में महात्मा ज्योतिबा फुले ने जमीन के सवाल को लेकर ‘किसान का कोड़ा’ जैसी रचनाएँ लिखीं। कहा जाता है कि सबै भूमि गोपाल की। पर ऐसा कभी हुआ नहीं। आदिम युग में जरूर सब भूमि गोपाल की थी। पर जैसे-जैसे सभ्यता का विकास होता गया, भूमि पर निजी कब्जे होते चले गए। जिसने सबसे ज्यादा भूमि हथियाई, वही बड़ा जमींदार बना और आगे चलकर संभवत: उन्हीं जमींदारों से राजा अस्तित्व में आए। भारत में राजतंत्रों में ब्राह्मणों ने राजा को ही गोपाल बना दिया और सब भूमि गोपाल की सब भूमि राजा की हो गई। इस सवाल को सबसे प्रमुखता से बीसवीं सदी में डॉ. अम्बेडकर ने उठाया कि जब सब भूमि राजा की है, तो वह निजी हाथों में कैसे चली गई? हालाँकि इस काम की शुरूआत भी राजाओं ने ही की थी। वे जिस भी व्यक्ति या वजीर पर खुश होते, उसे गाँव के गाँव जागीर में ईनाम में दे देते और इस प्रकार नए-नए जागीरदार और जमींदार बनते चले गए। किंतु राजतंत्रों के पतन के बाद जनता के राज्य में तो सब भूमि राज्य की होनी चाहिए थी और जमीन पर लोगों के निजी मालिकाना हक खत्म होने चाहिए थे। ऐसा क्यों नहीं हो सका? इसका कारण डॉ. अम्बेडकर एक तो यह बताते हैं कि समाजवादियों ने जमीन की इस लड़ाई को नहीं लड़ा और दूसरा कारण यह था कि भारत की शासन सत्ता राजाओं नवाबों और जमींदारों के हाथों में ही आई थी, जिसका सिरमौर ब्राह्मण था जो लोकशाही में भी ब्राह्मणशाही कायम रखना चाहता था। वह इस पक्ष में नहीं था कि शिक्षा, भूमि और उद्योग का राष्ट्रीयकरण हो, जो दलित वर्गों की आर्थिक उन्नति का कारण बने।
संसद में बहस करते समय डॉ. अम्बेडकर ने इस सवाल को जोरदार ढंग से उठाया था। उन्होंने सितंबर 1954 में अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग की वर्ष 1953 की रिपोर्ट पर चर्चा करते हुए सदन का ध्यान जमीन के इसी सवाल पर आकृष्ट कराया था। प्रश्न सरकार द्वारा दलितों को जमीन देने का था। डॉ. अम्बेडकर ने तीन सवाल किए। पहला क्या दलितों को देने के लिए जमीन उपलब्ध है? दूसरा क्या सरकार दलितों को जमीन देने के लिएए भूस्वामियों से जमीन लेने की शक्ति रखती है? और तीसरा यह कि यदि कोई दलितों को जमीन बेचना चाहता है तो क्या सरकार उसे खरीदने के लिए धन देगी? उन्होंने कहा कि यही तीन तरीके हैं जिनसे दलितों को जमीन मिल सकती है। उन्होंने कहा कि या तो सरकार यह कानून बनाए कि कोई भी भूस्वामी एक निश्चित सीमा से ज्यादा जमीन अपने पास नहीं रख सकता और सीमा तय हो जाने के बाद जितनी फालतू जमीन बचती है, उसे वह दलितों को उपलब्ध कराए। उन्होंने कहा कि यदि सरकार यह नहीं कर सकती तो वह दलितों को धन दे, ताकि यदि कोई जमीन बेचता है, तो वे उसे खरीद सकें। डॉ. अम्बेडकर ने इस बात का खंडन किया कि जमीन आर्थिक आजीविका का साधन है। उनका मत था कि भारत में जमीन रखना आर्थिक जीविका का मामला नहीं है, वरन सामाजिक हैसियत का मामला है। जमीन रखने वाला आदमी अपने आप को उस आदमी से उच्चतर हैसियत वाला मानता है, जो जमीन नहीं रखता है। यही कारण है कि कोई हिंदू नहीं चाहता कि दलित जातियों के लोग जमीन पाकर उच्च जातियों के समान स्तर पर पहुँचें जो हिंदू समाज व्यवस्था के विरुद्ध है। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि गाँवों में दलित जातियों के लोगों के लिए जमीन का एक छोटा टुकड़ा प्राप्त करना भी लगभग असंभव है।
इसी समस्या के मद्देनजर डॉ. अम्बेडकर इस बात को लेकर हैरान थे कि सरकार ने लोगों को जमीन रखने के मामले में सीमा का निर्धारण क्यों नहीं किया? उन्होंने कहा कि यदि सरकार यह काम करती तो सहज ही एक बड़ी जमीनी क्रांति हो जाती। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि सरकार किसान को भूमि का स्वामी बनाने के बजाए भूमि के स्वामित्व का अधिकार अपने पास रखती तो वह ऐसा कर सकती थी कि किसी को भी एक निश्चित सीमा से ज्यादा जमीन नहीं दी जाती। लेकिन सरकार ने यह बड़ी मूर्खता का काम किया कि उसने लोगों को जमीन का मालिक बना दिया। इस संबंध में डॉ. अम्बेडकर ने सदन को नेपोलियन का एक वाकया सुनाया। उन्होंने बताया कि एक बार टेलीरांड ने नेपोलियन से पूछा था ‘तुम्हें यूरोप से इतनी दुश्मनी क्यों है? तुम फ्रांस का सम्राट बनने के लिए तैयार क्यों नहीं हो जाते? मैं तुम्हारा प्रधानमंत्री बन जाऊँगा।’ नेपोलियन के महल के बाहर कुछ सैनिक खड़े थे। सूरज की रोशनी में उनकी बंदूकों की संगीनें साफ चमक रही थीं। नेपोलियन बहुत गुस्से वाला था। उसने टेलीरांड से पूछा कि तुम मेरे सैनिकों को देखते हो? उसने कहा हाँ, मैं उन्हें देख रहा हूँ। तब नेपोलियन ने पूछा कि तब मैं एक सम्राट क्यों नहीं हूँ? टेलीरांड ने उसका जो जवाब दियाए वह यहाँ महत्वपूर्ण है। उसने कहा कि तुम इन संगीनों से कुछ भी कर सकते हो पर तुम उन पर बैठ नहीं सकते। डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि इसी तरह जो निजी संपत्ति सरकार ने पैदा की है, उस पर वह बैठ नहीं सकती। पर जमीनों के मालिक उस पर जरूर बैठ जाएँगे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस भूमि का राष्ट्रीयकरण कर सकती थी पर उसने राजनैतिक चुनाव जीतने के लिए ऐसा कदम नहीं उठाया और स्थिति यह हो गई कि अब उसके लिए सीमा बनाना नामुमकिन हो गया है। लेकिन सरकार अब भी कह रही है कि वह दलितों को जमीन देगी। पर डॉ. अम्बेडकर ने सवाल उठाया जब भूस्वामियों से वह जमीन ले ही नहीं सकती, तो वह देगी कहाँ से? डॉ. अम्बेडकर का सुझाव था कि जो कृषि योग्य बेकार जमीन है, वह दलितों को दे दी जाए। योजना आयोग के अनुसार उस समय 98 मिलियन एकड़ जमीन बेकार पड़ी थी। उन्होंने कहा कि सरकार इस जमीन को संविधान में सूची संख्या एक में संशोधन करके अपने नियंत्रण में लेकर उसे दलितों को दे सकती है।
भूस्वामियों को मुआवजा देकर उनसे भूमि लेने के सवाल पर जब संविधान की धारा-31 पर बहस चल रही थी तो सदन में डॉ. अम्बेडकर संभवत: पहले व्यक्ति थे, जो उसके विरोध में थे। डॉ. अम्बेडकर के अनुसार जब धारा-31 बनाई जा रही थी तो उसे लेकर काँग्रेस में तीन गुट हो गए थे। नेहरू, पटेल और पंत तीनों में गहरे मतभेद थे। इस विवाद का निपटारा भूमि सुधारों की हत्या पर हुआ। डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि वह धारा इतनी बदसूरत है कि मैं उसकी तरफ देखना भी पसंद नहीं करता। भूमि सुधारों की हत्या का यह परिणाम हुआ कि भारत में न कोई आवास नीति बन सकी और न भू नीति। कोई कितनी ही मात्रा में जमीन खरीद सकता है, कितने ही फार्म हाउस बना सकता है और कितने ही मकान रख सकता है। न सीमा है और न कोई रोक.टोक। कोई एक हजार कमरों वाला महल बनाकर अकड़ रहा है तो कोई दस-दस फ्लैट्स खरीद कर अपनी शान दिखा रहा है और किसी के पास दूर-दूर तक फैली इतनी विशाल जमीन है कि वह उसे नंगी आँखों से भी नहीं देख सकता। घोड़े पर बैठकर दूरबीन से देखता है। जब सरकार ने सीलिंग लागू की तो इन विशाल भूधारकों से भूमि का एक इंच टुकड़ा भी सरकार नहीं ले सकी क्योंकि भूस्वामियों ने आनन-फानन में सारी जमीनें दूसरों के नामों पर ट्रांसफर कर दीं, यहाँ तक कि जानवरों के नामों पर भी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सरकार भी इस मामले में गंभीर नहीं थी। गंभीर इसलिए नहीं थी क्योंकि यही भूस्वामी सरकार में बैठे हुए थे। डॉ. अम्बेडकर ने कितना सही कहा था कि सरकार भूस्वामियों पर नहीं बैठ सकती, पर भूस्वामी सरकार पर जरूर बैठ जाएँगे।
डॉ. अम्बेडकर की दृष्टि में ‘यपीजेंट प्रोप्राइटरशिप’ का विचार ही खतरनाक था। जब सरकार ने रैयतवाड़ी की भूमि दूसरे भूस्वामियों को देने के लिए संशोधन बिल पेश किया थाए तो उन्होंने उसका विरोध करते हुए कहा था कि यदि भूस्वामित्व को इसी तरह बढ़ाया जाता रहा तो वह देश को तबाह कर देगा। पर सरकार उनसे सहमत नहीं हुई और बड़े-बड़े लैंड लार्ड्स अस्तित्व में आ गए जो आज पूरे शासन पर हावी हैं। इसने भूमिहीनों और खेतिहर मजदूरों की फौज की फौज खड़ी कर दी। वे उनकी जमीनों पर खून-पसीना बहाकर अनाज उगाते हैं और स्वयं भूखे मरते हैं। जमीन के मालिक संपन्न और जमीन को जोतने-बोने वाले विपन्न स्थिति में हैं।
ब्रिटिश सरकार में भी भूमिहीन किसानों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। चाहे रैयतवाड़ी प्रथा हो या कोई और। वे ऐसे किसान थे जिनके कब्जे में जमीनें तो थीं पर वे उसके मालिक नहीं थे। महाराष्ट्र में एक खोती प्रथा प्रचलित थी। रैयतवाड़ी में किसान सीधे सरकार को टैक्स देते थे पर खोती प्रथा में सरकार ने बिचौलिए रखे हुए थे, जिन्हें खोत कहा जाता था। उन्हें किसानों से टैक्स वसूलने के लिए कुछ भी करने की पूरी छूट थी। वे किसानों पर जुल्म करते थे। यहाँ तक उन्हें उनकी जमीनों से बेदखल भी कर देते थे। इसकी वजह से कानून-व्यवस्था बिगड़ने लगी थी। कुछ इलाकों में खोतों और किसानों के बीच हिंसक संघर्ष भी छिड़ गया था जिसमें कुछ खोतों की हत्या तक कर दी गई थी। डॉ. अम्बेडकर ने 1937 में खोती प्रथा के उन्मूलन के लिए बंबई विधानसभा में बिल प्रस्तुत कियाए जिसमें उनका जोर खोतों को समाप्त कर, उन किसानों को ही भूराजस्व संहिता के अंतर्गत वास्तविक दखलकार का दर्जा देने पर था, जो जमीनों पर खेती कर रहे थे। डॉ. अम्बेडकर के प्रयास से खोती प्रथा का उन्मूलन हुआ और किसानों को उनका हक मिला।
1927 में महाराष्ट्र सरकार ने बंबई विधानसभा में छोटे खेतों को खत्म करके बड़े खेत बनाने का विधेयक पेश किया था। डॉ. अम्बेडकर ने छोटे किसानों के पक्ष में बोलते हुए विधेयक का विरोध किया था। वे छोटे खेतों को अलाभकारी और अनुत्पादक मानने को तैयार नहीं थे। उनका कहना था किसी खेत का उत्पादक या अनुत्पादक होना, उसके आकार पर निर्भर नहीं करता। बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि किसान के पास आवश्यक श्रम और पूँजी है या नहीं। उन्होंने कहा कि समस्या का समाधान खेत का आकार बढ़ाने से नहीं, बल्कि सघन खेती से हो सकता है। लेकिन सरकार की नीति जमीन के बँटवारे को रोकने और चकों की
बिक्री करने की थी। डॉ. अम्बेडकर की
दृष्टि में यह नीति छोटे किसानों को तबाह करने वाली थी।
उन्होंने कहा कि इससे कृषि पर आधारित जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा भूमिहीन हो जाएगा और यह देश के लिए हितकर नहीं होगा कि गरीबों को इस ढंग से और गरीब कर दिया जाए। उन्होंने कहा कि इस नीति से कितने लोगों की दुर्दशा होगी, इसकी कल्पना करना कठिन है। वे छोटे खेतों को बड़े खेतों का रूप देने कोए दूसरों की कीमत पर कुछ भूस्वामियों को समृद्ध करने के रूप में देखते थे। उन्होंने कहा कि छोटे खेतों को खत्म करके उन्हें एक व्यक्ति के स्वामित्व में देने से खेती की समस्या हल नहीं होने वाली है। उनका सुझाव था कि इस समस्या को सहकारी खेती के द्वारा हल किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह बेहतर तरीका होगा कि सामान्य क्षेत्रों के लिए सहकारी कृषि को अपनाया जाए और उसमें स्थित छोटी जोत के मालिकों को बिना उनके निजी स्वामित्व को समाप्त किए खेती में शामिल होने के लिए विवश किया जाए। उन्होंने यह भी बताया कि कृषि की यह सहकारी व्यवस्था इटली और फ्रांस में प्रचलित है तथा इंग्लैण्ड के कुछ हिस्सों में इसको अपनाना अत्यधिक फायदेमंद रहा है।
1918 में डॉ. अम्बेडकर ने अपने अर्थशास्त्र के अध्ययन के दौरान ‘स्माल होल्डिंग्स इन इंडिया’ नाम से एक शोध पत्र भी लिखा था, जो 1918 के जर्नल आॅफ द इंडियन इकोनोमिक सोसाइटी के खंड-1 में छपा था। इस शोध पत्र में उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि छोटे खेतों की बुराई भारत की खराब सामाजिक अर्थ व्यवस्था से पैदा हुई है। इसलिए उनका जोर इस बात पर था कि भारत की कृषि समस्या का हल उसका औद्योगीकरण है। जमीन के सवाल पर डॉ. अम्बेडकर इस कदर गंभीर थे कि 1946 में उन्होंने आल इंडिया शेडयूल्ड कास्ट फेडरेशन की ओर से संविधान सभा को भूमि के राष्ट्रीयकरण की माँग को लेकर ज्ञापन दिया था। यह ज्ञापन स्टेट्स एंड मायनारिटीज नाम से आज उपलब्ध है।
इसमें उन्होंने दलित वर्गों और अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों की माँग के साथ-साथ भारत के आर्थिक ढाँचे को भी संविधान द्वारा निर्धारित करने की माँग रखी थी। यह आर्थिक ढाँचा राज्य.समाजवाद का था, जिसमें उन्होंने भूमि, शिक्षा, बीमा और उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करने पर जोर दिया था। जमीन के संबंध में इस ज्ञापन में उन्होंने कहा था कि कृषि राज्य उद्योग होगाए जो इस आधार पर संगठित किया जाएगा कि राज्य भूमि को मानक आकार के फार्मों में विभाजित करेगा और उन्हें गाँव के निवासियों को जाति या पंथ के भेदभाव के बिना पट्टे पर इस रीति से देगा कि कोई जमींदार न रहे, कोई पट्टेदार न रहे और न कोई भूमिहीन मजदूर रहे। फार्म पर सामूहिक खेती की जाएगी और पानी, उपकरण, बीज और खाद आदि की व्यवस्था राज्य करेगा। फार्म की उपज पर टैक्स लेने के लिए राज्य सक्षम होगा और वह उन पट्टेदारों के विरुद्ध भी कार्यवाही करने के लिए सक्षम होगा, जो पट्टेदारी की शर्तों को तोड़ेंगे। ज्ञापन में अपनी बात का खुलासा करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि भारत का तेजी से औद्योगीकरण करने के लिए राज्य समाजवाद अनिवार्य है। निजी पूँजीवाद आर्थिक विषमता को पैदा करेगा, जैसा कि उसने यूरोप में किया है और वह भारतीयों के लिए एक चेतावनी होनी चाहिए।



