- Post by दलित आन्दोलन 2017-11-06
जिस देश में होगी नहीं नैतिकता, उसका भविष्य होगा कठिन : डॉ. अंबेडकर
बाबासाहब का जीवन इस बात का उदाहरण है कि व्यक्ति का दृढ़निश्चय ही उसका निर्माण करता है, उसकी जाति, पारिवारिक निर्धनता, असुविधाएँ और समाज का विरोध उसकी प्रगति को रोक नहीं सकता। उन्होंने अपना बहुगुण सम्पन्न व्यक्तित्व स्वयं निर्माण किया था जिसमें अथक परिश्रमशीलता, विलक्षण गम्भीरता, अद्भुत साहस तथा निस्वार्थ त्याग की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी।
सफलता और सम्मान न मिलने पर भी चलते रहो- उनका सम्पूर्ण जीवन युवकों के लिये प्रेरणा का द्मोत है। उन्होंने देश के तरुणों को परिश्रमी तथा गुण सम्पन्न बनने का आह्नान किया। वे चाहते थे कि देश के तरुण अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित, धुन के पक्के, सत्यनिष्ठ और अध्ययनशील हों। सफलता के फल को प्राप्त किये बिना भी परिश्रम करते रहना सामान्य बात नहीं परन्तु यह आवश्यक है।
यदि आपका उद्देश्य और कार्य पद्धति ठीक-सुविचारित है और आप अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और आकांक्षाओं को छोड़कर कार्य में लगे हुए हैं तो फिर निराशा का कोई कारण नहीं। बाबासाहब कहते हैं-सम्मान की आकांक्षा करना कोई पाप नहीं है परन्तु यदि कार्य करते-करते भी सम्मान प्राप्त नहीं होता है तो आप अपना संघर्ष निराश होकर छोड़ मत दीजिये और यदि दुर्भाब्य से आप उस सम्मान से वंचित कर दिये जायें, जिसके कि आप वास्तविक अधिकारी है,फिर भी आप धैर्य न छोड़े। उन्होंने स्वयं का एक उदाहरण दिया जब कि मूकनायक के सम्पादक ने नववर्ष के विशेषांक में अपनी स्वयं की प्रशंसा के तो अनेक पुल बाँधे परन्तु समाचार पत्र के संस्थापक डॉ. अम्बेडकर के बारे में जिक्र तक नहीं किया। डॉ. अम्बेडकर कहते हैं, मेरे को सन्तोेष है कि वह पत्र अपने उद्देश्य के अनुसार अस्पृश्यों की सेवा कर रहा है।
तिलक तरुणों के सम्राट थे- 1 अगस्त, 1920 को लोकमान्य तिलक की मृत्यु हो गयी। तिलक का व्यक्तित्व, विचार और कृतित्व हिमालय सदृश था। उस युग में उनके समकक्ष दूर-दूर तक भी कोई वैसा दूसरा व्यक्तित्व ढूँढ़ना असम्भव था लोकमान्य तिलक ने आज से बहुत पहले ही यह कहा था कि यदि ईश्वर अस्पृश्यता को मानेगा तो मैं उसके अस्तित्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं हूँ। वे सच में महामानव थे। वे भारत के क्रान्तिकारी युग के पितामह देश की तरुणाई के महानायक तथा स्वतन्त्रता संग्राम के जनक कहे जाते थे। इस देश के लाखों युवकों ने उनके महान जीवन से प्रेरणा लेकर राष्ट्र के लिये सर्वस्य अर्पण करने का संकल्प लिया था। उनकी मृत्यु से सारा देश दु:ख के अथाह सागर में डूब गया। डॉ. अम्बेडकर उन दिनों लन्दन में अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे थे परन्तु भारत की सभी गतिविधियों से पूरी तरह जुड़े हुए थे। उनकी मृत्यु की इस महान घटना के कुछ वर्ष पश्चात् डॉ. अम्बेडकर ने लिखा- ‘भारत एक अन्धकार के युग में डूब गया।‘
बाबासाहब का चरित्र के प्रति आग्रह सर्वाधिक था उनका मानना था कि तुम चाहे किसी भी स्थान पर हो चरित्रवान रहो। उन्होंने उत्तम जीवन को अत्यधिक महत्व दिया जिसके लिये वे तीन बातें आवश्यक मानते थे-ज्ञानोपार्तन, चरित्र निर्माण और सामाजिक हितों के लिये निष्ठा। इन तीनों में वे चरित्र निर्माण को प्रमुख मानते थे। डॉ. साहब के सम्पर्क में जो भी व्यक्ति आता था वह उससे कहते थे कि चरित्रवान बनो। तुम अपना ऐसा चरित्र बनाओं कि लोग तुम्हारी ओर उँगली न उठा सकें। लोग मेरी राजनीति की कुछ भी आलोचना करें किन्तु वे मेरे चरित्र की ओर उँगली नहीं उठा सकते। यदि उन्होंने मेरे चरित्र में कोई कमी देख ली होती तो वे मेरी धज्जियाँ उड़ा देते और मुझे कहीं का भी नहीं रहने देते। वे मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सके इसका मुख्य कारण मेरा चरित्र ही है। जो तुम्हें सबसे बड़ी वस्तु सीखनी है, वह उत्तम चरित्र निर्माण की बात है। वही तुम्हें समाज में सम्माननीय बनाएगी दूसरी अन्य कोई वस्तु नहीं।
डॉ. अम्बेडकर के अनुसार चरित्र निर्माण में यर्थार्थता का होना आवश्यक है अर्थात बनावटीपन नहीं होना चाहिए। डॉ. अम्बेडकर को दोगलेपन तथा पाखण्ड से घृणा थी। उन्होंने चरित्र निर्माण में सरलता एवं सच्चेपन को महत्वपूर्ण तत्व माना। वह उन लोगों का बड़ा सम्मान करते थे जो स्पष्ट, सरल और सच्चे होते थे। उन्हें ऐसा व्यक्ति कतई पसन्द नहीं था जो कहे बहुत कुछ परन्तु करे कुछ भी नहीं।
सार्वजनिक जीवन में प्रामाणिकता- सार्वजनिक जीवन में पवित्रता का उनका आग्रह कठोर था। डॉ. साहब ने अपना सार्वजनिक जीवन अत्यन्त पवित्र रखा था। वे जीवन में प्रामाणिकता का आग्रह करते थे। भ्रष्टाचार तथा बेईमानी से वे मीलों दूर थे। सार्वजनिक रूप से एकत्रित पैसे का वे व्यवस्थित हिसाब रखवाते थे।
14 जुलाई 1952 को बम्बई के दामोदर-हाल में आयोजित सभा में भवन निर्माण फण्ड के विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा-‘हमारे लोगों ने जो धनराशि एकत्रित की है उसमें 5000 रु. की आय के श्रोत का पता नहीं चल पा रहा है। ऐसा क्यों हुआ है ? कारण स्पष्ट है कि पावती पुस्तकें वापस जमा नहीं हुई हैं, उन पावती पुस्तकों वापस जाम नहीं हुई हैं। उन पावती पुस्ताकें में और भी धनराशि का लोगों द्वारा हड़प किये जाने का सन्देह निर्माण होना स्वाभाविक है। इस सन्देह को दूर करने के लिए लोगों के द्वारा ली गयी समस्त पावती पुस्तिकाओं को उनके द्वारा प्राप्त धनराशि के साथ जमा न करना होगा। पावती पुस्तकों को वापस न करना अथवा प्राप्त धनराशि को जमा न करना कानून की दृष्टि से दण्डनीय अपराध है यह बात सभी को ध्यान में रखनी चाहिए। गरीब जनता द्वारा दी गयी धनराशि का हिसाब आपको ठीक प्रकार रखना चाहिए। एक पैसे की भी गडबड़ न होने पाये, उसकी सावधानी रखनी होगी। सार्वजनिक धन का हिसाब व्यवस्थित रखकर उसे समय-समय पर जनता के सम्मुख रखने से बढ़कर पवित्र कार्य कोई और नहीं हो सकता और सर्वजनिक धन का आहार करने जैसा नीच कृत्य भी दूसरा कोई हो नहीं सकता।‘
सफलता के लिए असंवैधानिक मार्ग न अपनाएँ- सन 1954 में भण्डारा का उपचुनाव था। बाबासाहब भी शिड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के नाम से चुनाव लड़ रहे थे। दो मत डालने की पद्धति होने के कारण दूसरा वोट काँग्रेस के विरोधी प्रत्याशी को ही मिलने वाला था। यद्यपि काँग्रेस ने आचार्य कृपलानी तथा अशोक मेहता जैसे विरोधी पक्ष के नेताओं के विरुद्ध प्रत्याशी खड़े नहीं किये थे परन्तु बाबा साहब के सामने उन्होंने प्रत्याशी खड़ा किया था। बाबासाहब के समर्थक कार्यकतार्ओं की बैठक में गर्मागर्म बहस हो रही थी। अधिकांश लोगों का कहना था कि यदि हमने अपना दूसरा वोट विपक्ष को (जिससे समझौता हुआ है) दिया तो काँग्रेस का प्रत्याशी जीतेगा और बाबा साहब की हार होगी। इसलिए अपना दूसरा वोट नष्ट कर देना चाहिए। यह चर्चा चल ही रही थी तभी बाबा साहब भी बैठक में आ पहुँचे। उनके पूछने पर लोगों ने स्पष्ट किया कि हम अपना दूसरा वोट व्यर्थ कर देंगे, तभी आप जीत सकते हैं।
यह सुनकर बाबासाहब गम्भीर होकर बोले, मैने भारत का संविधान बनाया है और मैं इस बात को कभी सहन नहीं कर सकता। मैं अपने अनुयायियों को संविधान के विरुद्ध व्यवहार करने अर्थात् दूसरे वोट का प्रयोग न करने के लिये कभी नहीं कह सकता। न तो मैं इसके लिये अनुमति दूँगा और न ही संविधान के विरुद्ध इस व्यवहार को सहन करूँगा। चुनाव में हार जाना मैं बेहतर समझूँगा। फलस्वरूप बाबा साहब चुनाव हार गये और चुनाव जीतने का इतना सरल नुस्खा उपलब्ध होते हुए भी उसे न अपना कर उन्होंने हार जाना स्वीकार किया वह भी केवल इसलिये कि भारत के जिस संविधान का निर्माण उन्होंने किया उसकी रक्षा हो। उनकी इस सिद्धान्त निष्ठा से भी उनके असाधारण व्यक्तित्व का परिचय मिलता है।
नेतृत्व करना आसान नहीं- डॉ. साहब कहते है कि समाज का नेतृत्व करने के लिए व्यक्ति को गुणी और परिश्रमी होना चाहिए। सफल नेतृत्व के लिये क्या करना होगा इसको वे समझाते हैं-’ जिसमें धैर्य नहीं, वह नेतृत्व नहीं कर सकता। जो मरने के लिये सदैव तैयार रहता है उससे मृत्यु भी दूर भागती है, जो मृत्यु से डरता है वह मृतवत है।
‘यदि कोई राजनीतिक क्षेत्र में कार्य करना चाहता है तो उसे राजनीति का गहन अध्ययन करना चाहिये। हमारे कार्यकतार्ओं को राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक आदि समस्याओं का गहराई से अध्ययन करना होगा। अध्ययन चिन्तन और मनन के साथ-साथ समाज की उन्नति के लिये अहर्निश शारीरिक श्रम करना भी हमारे समाज के नेता के लिए आवश्यक है। तभी उसके द्वारा समाज का थोड़ा बहुत भला हो सकेगा। समाज तभी उकसा नेतृत्व स्वीकार करेगा। ‘शायद आप सोचते हैं कि नेता बनना सरल है परन्तु मेरे विचार से नेता बनना बहुत ही कठिन कार्य है। मेरा तो यही अनुभव है क्योंकि अन्य लोगों जैसा मेरे नेतृत्व का स्वरूप नहीं है। मैंने जब यह आन्दोलन प्रारम्भ किया तब आज जैसा कोई संगठन नहीं था। मुझे ही सब काम करना पड़ता था। संगठन खड़ा करने के लिए भी मुझे ही खपना पड़ता था। समाचार पत्र शुरू करना भी मेरा ही सिर दर्द हुआ करता था। मूक नायक, बहिष्कृत भारत, जनता आदि समाचार पत्र चलाना हो या प्रिन्टिग प्रैस चलाना हो, सभी मोर्चे मुझे ही सँभालने पड़े थे। संक्षेप में यही कहना होगा कि मुझे शून्य में से सृष्टि का निर्माण करना पड़ा।‘
कृतज्ञता महान गुण- चरित्र निर्माण की प्रक्रिया में डॉ. अम्बेडकर ने कृतज्ञता को भी मूल्यवान माना। उनका कहना था कि आदमी को अपने ऊपर किये गये उपकारों के प्रति अवश्य ही कृतज्ञ होना चाहिए। वह उस व्यक्ति को क्षमा नहीं करते थे जो किये गये उपकार को भूल जाए और भलाई करने वाले के अहसान को न माने। विदेशों में जाकर विद्याध्ययन करने में, उनकी महाराजा बड़ौदा ने बहुत सहायता की थीं वे उसी ऋण को चुकाने के लिये बड़ौदा नौकरी करने गये। वहाँ से अपमानित होकर लौटे परन्तु राजा साहब के प्रति वे जीवन भर कृता बने रहे और जीवन में कभी भी महराजा के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं बोला। डॉ. साहब का विचार था कि चरित्र निर्माण में कृतज्ञता एक महान गुण होता है।
डॉ. भीमराव विदेशों में रहते समय पाश्चात्य देशों की चमक-दमक से आकर्षित नहीं हुए। वे कहते थे, ‘व्यक्ति स्वयं अपना चरित्र बनाता है। चरित्र व्यक्तिगत प्रयत्न का परिणाम है जो अपने जीवन में उत्तम सिद्धान्त रखते हैं और उसके लिये निष्ठा से प्रयत्न करते हैं, वे ही उत्तम चरित्र निर्माण कर सकते है। उत्तम चरित्र का निर्माण संसार के तूफानों के मध्य होता है। महापुरुषों के चरित्र का विशेष गुण उनका प्रत्येक अवस्था के वज्र के समान दृढ़ रहना है। विरोधी परिस्थितियों में भी वे शिला समान स्थिर रहते हैं।‘
‘उन्होंने उत्तम चरित्र को सामाजिक हित की भावना और कर्तव्य से भी जोड़ा अन्यथा अच्छे चरित्र का क्षेत्र सीमित हो जाता है। इस प्रकार उनकी यह आकांक्षा थी कि लोग अपने चरित्र को मानव मूल्यों और जनतांत्रित कर्तव्यों से ओत-प्रोत बनाएँ ताकि भावी पीढ़ी उनका अनुकरण करती रहे’। चरित्र ठीक रहा तो प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री कोई भी बने- बाबा साहब कहते थे- ‘देश की राजनीति में शीर्ष स्थान पर बैठे लोग चरित्रवान होने चाहिए। सम्पूर्ण समाज के उत्कर्ष का मनोभाव और व्यक्तिगत स्वार्थों की शून्यता ही श्रेष्ठ चरित्र का लक्षण है’। 4 जनवरी, 1954 को आचार्य पी. के. आत्रे द्वारा निर्मित फिल्म महात्मा फुले का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा, ‘आज देश में चरित्र ही नहीं बचा है। जिस देश में नैतिकता नहीं होती, उसका भविष्य कठिन होता है। फिर देश का प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू हो या कोई और, तुम्हारा भविष्य अंधकारमय ही रहेगा। मंत्री देश का उद्धार नहीं करते। जिसने धर्म को भली भांति समझा है वही देश को तार सकता है। महात्मा फुले ऐसे ही र्धम सुधारक थे। विद्या, करुणा, शील और मैत्रीभाव इन धर्म तत्वों से प्रत्येक को अपना चरित्र बनाना चाहिए। करुणा का अर्थ है-मानव-मानव के बीच आपसी प्रेम। मनुष्य को इसके लिए आगे बढ़ना चाहिए।‘



