सहारनपुर घटना की मीडिया के माध्यम से देश में भारी चर्चा हुई। दलित विषयक चिंतकों ने अपने-अपने विमर्श में इसे अन्यान्य दृष्टिकोण से देश के समक्ष रखा। राजनीतिक पार्टियों ने वर्तमान सत्ता और व्यवस्था पर सीधे-सीधे एवं प्रकारांतर से अनेकानेक वार-प्रत्यावार किये। सरकार और प्रशासन की असफलता का आरोप लगाकर मोदी जी और योगी जी की छवि बिगाड़ने के साथ-साथ दलित समाज को लक्ष्य बनाकर समाज और देश को भी उबालने का प्रयास भी हुआ। देश ने इसे बड़ी सरलता से समझ लिया।
सहारनपुर में जो भी हुआ, वह निंदनीय है किंतु सहारनपुर की घटना के उपरांत दलितों के उत्थान के नाम पर बनी भीम आर्मी को अपनी पहचान एवं आर्थिक स्थिति को सशक्त बनाने का एक बड़ा अवसर प्राप्त हुआ। भीम आर्मी ने इस अवसर का लाभ लेने एवं अपना प्रचार-प्रसार के साथ सदस्यता बढ़ाने में कोई लचीलापन नहीं दिखलाया। सदस्यों की संख्या के साथ विविध प्रकार के धन प्राप्त होने से भीम आर्मी के नेताओं की आर्थिक स्थिति बहुत शक्तिशाली हुई।
दलितोत्थान के लिए संस्थाएं बने और लोग संगठित हो, साथ मिलकर संघर्ष करे, धरना-प्रदर्शन कर, देश को आभाष भी करा दे कि दलित शक्ति क्या है, किंतु सहारनपुर की घटना और उसके उपरांत, उस घटना को अवसर के रूप में उपयोग पर समाज को यह शंका होता है कि कहीं सहारनपुर की घटना के पार्श्व में नकारात्मक शक्तियों की भूमिका तो नहीं है? ऐसा चिंतन करने के कई कारण स्पष्ट दृष्टिगत है। भीम आर्मी की सदस्यता के लिए आह्वान को देखा जाए तो ‘दसवीं फेल’ (अनुत्तीर्ण) योग्यता मांगी गई है। किसी दलितोत्थान के लिए बनी संस्था का इस तरह शिक्षा के नाकारात्मक अभिव्यक्ति को कैसे उचित ठहराया जा सकता है। डॉ बी आर अंबेडकर के ‘शिक्षित बनों’ के आह्वान का परिहास उचित नहीं। दसवीं फेल की जगह आठवीं पास का भी आह्वान हो सकता था। इसके साथ सदस्यता शुल्क लेना उचित है, किंतु आज अपराधियों, माफियाओं, समाज को बांटने वाली शक्तियों के साथ अरब के इस्लामिक संगठनों और भारत में धर्मपरिवर्तन का खेल खेलती इसाई मिशनरियों के फंड का बड़ा धड़ल्ले से देश में उपयोग हो रहा है। भारत सरकार ने तो देश एवं समाज विरोधी कुकृत्यों के लिए धन उपलब्धता कराने वाली सोलह हजार संस्थाओं को भी काली सूची में डाल दिया है। लेकिन भीम आर्मी आज खनन माफियाओं एवं उक्त तरह के लोगों से धन उगाही के लिए साठ-गांठ के मामले में उजागर हुई है।
दलितोत्थान की दिशा में संगठन एवं संगठनकर्ता के अधिष्ठान की पवित्रता आवश्यक है। डॉ बी आर अंबेडकर ने हमें यही शिक्षा और संदेश दिया है। उन्होंने ईसाई मिशनरियों, अरब के शेखों, हैदराबाद के नवाब एवं ऐसे हजारों तरह के लोगों के आर्थिक एवं राष्टविरोधी शक्तियों के आर्थिक सहयोग के प्रस्तावों को ठुकराते हुए अपने संघर्ष के अधिष्ठान को पवित्र रखा। उन्होंने दलितोत्थान के संघर्ष को राष्टविरोधी शक्तियों के समझ कभी-कभी गिरवी नहीं रखा। उन्होंने ऐसी शक्तियों से कभी समझौता नहीं किया। आज धन के लिए हमारे नेता का देश, समाज एवं अपने आप का सौदा करते हुए देखे जा सकते हैं। आज आवश्यकता है कि दलितोत्थान के अधिष्ठान को पवित्र रखते हुए इस दिशा में सकारात्मक चिंतन एवं डॉ बी आर अंबेडकर के द्वारा आलोकित पथ का अनुसरण किया जाय।