- Post by डॉ. विजय सोनकर शास्त्री 2017-06-26
कन्हैया कुमार, जिग्नेश मेवानी, हार्दिक पटेल और अब चंद्रशेखर उर्फ रावण। यह चंद नाम है, पर इन सबके बीच आखिर सम्बन्ध क्या है ? और ये नाम क्यों मीडिया की सुर्खिया बने हुए हैं ? इन सवालों का जवाब तलाशना कोई जटिल काम नहीं हैं। देश में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में 2014 में भाजपा की सरकार बनने के बाद से ही यह सभी नाम एक के बाद एक करके सामने आये और इस कड़ी में भीम आर्मी के स्वयंभू नेता चद्रशेखर उर्फ रावण का नया नाम सामने आया है।
उत्तर प्रदेश स्थित सहारनपुर में तथाकथित रूप से दलित कल्याण के नाम पर बनाई गयी भीम आर्मी के नेता चद्रशेखर भी मुखर रूप से तब सामने आये, जब राज्य में भाजपा के नेतृत्व में योगी सरकार ने अपना कामकाज संभाला। उत्तर प्रदेश में दलित अत्याचार के नाम पर भीम आर्मी ने जो कुछ भी किया, वह देश भर में जातीय संघर्ष के रूप कुछ इस तरह से प्रचारित किया गया, जिससे देश के लोग यह मानने लगे कि भाजपा सरकार में दलित सुरक्षित नहीं है।
सहारनपुर स्थित सब्बीरपुर गांव से शुरू हुई कथित जातीय हिंसा की शुरूआत इसी साल उस समय शुई थी जब 14 अप्रैल को गांव में कथित रूप से ठाकुर समाज के लोगों ने डॉ भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा नहीं लगने दी थी। इसके बाद डॉ आंबेडकर की शोभा यात्रा पर रोका गया और फिर हिंसा हुई।यहां पर गौर करने लायक बात यह भी है कि डॉ अंबेडकर की शोभायात्रा को रोकने और फिर हिंसा फैलाना में मुस्लिम समुदाय के लोगों का हाथ था, पर इस घटना को इस तरह से पेश किया गया कि मुस्लिम समुदाय तो दलितों के साथ है, पर हिन्दू जाति के उच्च वर्ग के लोग दलितों पर अत्याचार कर रहे है। इसके बाद एक महीने के भीतर कई बार जातीय हिंसा हुई, जमकर उपद्रव हुआ, कई दर्जन घर जलाये गये, कई घायल हो गये। उपद्रव में एक युवक की जान भी चली गई। घटना को दलित समाज पर कथित अत्याचार के रूप में पेश करने के बाद भीम आर्मी के कार्यकतार्ओं ने हजारो की संख्या मे शहर के कई इलाको में जमकर उत्पात मचाया। यह सिलसिला अभी थम भी नहीं पाया था कि वोट बैंक बचाने की आड़ में दलितों का हालचाल लेने के लिए पहुंची बसपा नेत्री मायावती ने एक बार फिर हालात को खराब करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और उन्होंने भी आग में घी डालने का काम किया।
आखिर सहारनपुर के कथित जातीय संघर्ष और दलित उत्पीड़न से लेकर हैदराबाद के रोहित वेमुल्ला प्रकरण और दिल्ली में तमिलनाडु के किसानों के कथित आंदोलन से लेकर गुजरात में दलित उत्पीड़न की आड़ में पैदा हुए कथित नेता हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवानी के बीच आखिर सम्बन्ध क्या है? क्या वास्तव में देश में दलित उत्पीड़न की घटनाये बढ़ी हैं? क्या दलित-मुस्लिम एकता के कथित पैरोकार जातीय विद्रेष के कारण ‘दलित कल्याण’ के नाम पर दलितों को मुस्लिमों के साथ खड़ा होने के लिए एकजुट हुए हैं ? ऐसे कई सवाल आम जनमानस के दिमाग में हो सकते हैं, पर सच वह नहीं हैं, जैसा दिखाया और बताया जा रहा हैं।
याद कीजिए 2014 और 2015 का वह समय, जब राष्ट्र में सभी ने देखा है कि किस प्रकार से विभिन्न विश्वविद्यालयों में अफजल गुरु और याकूब मेनन के शहादत दिवस मना कर कश्मीरी अलगाववाद को समर्थन किया गया। बात सिर्फ यही तक सीमित नहीं रही। इन घटनायों की आड़ में दलित विमर्श की एक नयी राष्ट्र विरोधी राजनीति और रणनीति को वैधता देने की कोशिश भी शुरू की गयी और इसके लिए कथित रूप से दलित रोहित वैमुला के परिवार को आगे किया गया। इस नयी रणनीति को अंजाम देने के लिए कन्हैया कुमार और उमर खालिद को आगे करके राष्ट्र विरोधी तत्व अपना नया खेल खेलने की फिराक में एकजुट हुए। इन सभी का मकसद सिर्फ और सिर्फ यह था कि कश्मीर की आजादी से लेकर दलितों यानि दलित वर्ग के हिन्दुओं का दमन एवं दलन को एक ही मुद्दे के रूप में किस तरह से उठाया जाए।
केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार का गठन होने के बाद से देश में दलित और मुस्लिम एकता के नारे पर कुछ ज्यादा ही जोर दिया जा हैं। दलित-मुस्लिम एकता के नारे को बढ़ावा देने वाले नेता अपने बयानों में दलित मुस्लिम एकता की जोरदार वकालत कर रहे हैं और देश को तोड़ने वाली वामपंथी विचारधारा के विचारक अपने लेखों में यह साबित करने में जुट गए हैं कि भारत देश में दलित-मुस्लिम एकता एक स्वाभाविक प्रक्रिया हैं। जबकि वह इस सवाल पर खामोश हो जाते हैं कि मोदी सरकार से पहले 65 सालों तक जो सरकारें सत्ता में रहीं, उन्होंने आखिर दलित कल्याण के लिए ठोस एवं परिणाम देने वाले वास्तविक कदम उठाने में ढिलाई क्यों क्यों बरती? क्यों नहीं, ऐसे उपाय किए गए, जिससे दलित समाज मुख्यधारा के साथ कदम से कदम मिलाकर चल पाता?
दलितों के नाम पर राष्ट्र को अराजकतावाद के हवाले करने की कोशिशों को सही साबित करने के बीच प्रश्न यह भी है कि जिस मुस्लिम विचारधारा ने देश में सैकड़ों सालों तक अपनी सत्ता के दौरान हिन्दुओं का दमन और दलन के उपरान्त को साजिशों के तहत तहस-नहस करके उनका दलित नामक एक ऐसा समूह पैदा कर दिया, जिसे अंग्रेजों ने हिन्दुओं के खिलाफ खड़ा करने के लिए हमेशा कोशिश की। और अब एक बार पुन: फिर वही कहानी देश में दोहराने के प्रयास शुरू हो गए हैं और इसके लिए देश में मौजूद और सक्रिय ईसाई नेटवर्क भी अपनी पूरी ताकत लगा रहा है।
दलित मुस्लिम एकता से जुड़े इतिहास पर गौर किया जाये तो भारत विभाजन के पहले बंगाल के दलित नेता जोगेंद्र नाथ मंडल ने दलित-मुस्लिम एकता की बात की थी और उन्होंने मुस्लिम लीग और पाकिस्तान की मांग को अपना समर्थन दिया था। मंडल ने तत्कालीन समय में डॉ भीमराव अम्बेडकर की उस सलाह को भी नहीं माना, जिसमे अम्बेडकर ने जनसंख्या का पूरी तरह स्थानांतरण का पक्ष रखते हुए दलित हिन्दुओं को पाकिस्तान छोड़कर भारत आने के लिए कहा था। यही वजह रही कि पूर्वी पाकिस्तान में बड़ी संख्या में दलित रह गए। वर्तमान बांग्लादेश की कुल हिन्दू आबादी की जनसंख्या का 95 प्रतिशत दलित हैं। मंडल की वजह से बंगाल के कई हिस्से पूर्वी पाकिस्तान में चले गए। जिन्ना के इशारे पर पाकिस्तान के पक्ष में दलितों की बड़ी संख्या में किये गए मतदान की वजह भी मंडल ही थे। पाकिस्तान की पहली सरकार में कानून मंत्री बनने वाले मंडल तो 1960 में अपने पद से इस्तीफा देकर भारत भाग आये। लेकिन उनकी सलाह मानने वाले दलित बहुसंख्यक हिन्दुओं को अब तक मुस्लिम अत्याचारों से मुक्ति नहीं मिली है। बांग्लादेश और पाकिस्तान में अब भी सैकड़ों दलित बहु-बेटियों की इज्जत लूटी जा रही है एवं उन्हें बलपूर्वक मुसलमान बनाया जा रहा है।
दलित और मुस्लिम एकता की बात करने वाले तत्व शायद यह भूल गए हैं कि पूर्वी पाकिस्तान जब बांग्लादेश बना था, उस वक्त पूर्वी पाकिस्तान में मुस्लिम सैनिकों ने सिर्फ आठ माह के अंदर सैन्य कार्रवाई में लगभग तीस लाख हिन्दुओं का कत्ल कर दिया था। मरने वालों में सबसे ज्यादा वो हिन्दू शामिल थे, जिन्हे एक साजिश के तहत मुस्लिमो और अंग्रेजों ने दलित का दर्जा देकर हिन्दू समाज को बांट कर उन्हें वहां रोकने का काम किया था। वास्तव में उन्हें वहां रोकने के पीछे सच्चाई यही थी कि यदि वह भारत चले आते तो वहां कर्मकार एवं सफाईकर्मियों की भारी समस्या खड़ी हो जाती।
पूर्वी पाकिस्तान जब टूटा और बांग्लादेश बना तो सबसे बड़ा कहर इसी हिन्दू आबादी पर टूटा और उनका कत्लेआम इतिहास के पन्नों की सुर्खियों में दर्ज हो गया। यह ऐतिहासिक सत्य है कि पाकिस्तान में बची हिन्दू आबादी यानि दलित हिन्दुओं को बटवारे के समय भारत आने से जानबूझकर रोका गया। आर्थिक रूप से सक्षम हिन्दुओं की बड़ी संख्या तो भारत आ गयी लेकिन दलित हिन्दू अपनी कमजोर स्थिति के कारण या तो आ नहीं पाये और उन्हें इसलिए भी भारत आने से रोका गया क्योकि अगर वो भी इधर आ जाते तो मुस्लिम समाज में चमड़े और सफाई का काम कौन करता?
कुछ ऐसा ही देश के अंदर भी हुआ। आजादी के दौरान हैदराबाद में रजाकारों का कहर सबसे ज्यादा दलित समाज पर ही टूटा और कत्लेआम और जबरन धर्मपरिवर्तन का जो खुला खेल खेला गया, उसमें सबसे ज्यादा दमन एवं दलन दलित समाज का ही हुआ। यह संयोग नहीं, बल्कि उसी मानसिकता के तहत एक बार फिर कथित दलित-मुस्लिम एकता की सबसे ज्यादा आवाज उसी हैदराबाद से उठी।
आज भी हिन्दू समाज पर सबसे ज्यादा अत्याचार की खबरें पाकिस्तान और बांग्लादेश से ही आती है और पीड़ित वर्ग में सबसे ज्यादा यानि 95 प्रतिशत हिन्दू दलित ही हैं। जबरन धर्म परिवर्तन एक आम समस्या का रूप ले चुकी हैं। तो क्या इसी को दलित-मुस्लिम एकता का नाम दिया जा रहा है?
देखा जाये तो भारत में दलित-मुस्लिम एकता का कोई सरोकार नहीं है और न ही इस नारे के जरिये कोई सकारात्मक पहल की उम्मीद की जा सकती है। वास्तव में दलित हिन्दू तो हिन्दू समाज का एक बड़ा हिस्सा है। हिन्दू समाज में दरार पैदा करने के लिए देश पर राज करने वाले मुस्लिम और अंग्रेज शासकों ने इस दलित समाज को पैदा किया और अपने हितों एवं स्वार्थो के लिए हमेशा इस्तेमाल किया। भारत का दलित एक सामाजिक वर्ग या श्रेणी है और मुस्लिम एक महजबी जमात। दोनों के बीच न तो कोई समानता है और न ही कोई साझा मसला और न ही कोई साझा रीत रिवाज। इसलिए दलित-मुस्लिम एकता के राग के पीछे का सच को समझना कोई मुस्किल काम नहीं है। इस राजनैतिक छलावे की भारी कीमत दलितों ने स्वतंत्रता एवं बटवारे के समय चुकाई है।
अतीत से सबक न लेकर एक बार फिर देश में उसी खेल को खेलने की तैयारी की जा रही है। इसके तहत यह झूठ फैलाया जा रहा है कि किस तरह से अपनी समस्या का समाधान करने के लिए दलितों ने मुस्लिम धर्म को अपना लिया। जबकि सच यह है कि इस देश में इस्लामिक धर्मांतरण तलवार की नोंक पर एवं बलपूर्वक हुआ है। कोई यह नहीं बताना चाहता है कि सिर्फ दलित ही नहीं, बल्कि बलपूर्वक मुस्लिम धर्म अपनाने वालों में तथाकथित अगड़ी जाति का भी एक बड़ा हिस्सा था। राजस्थान से लेकर कई और राज्यों में राजपूतों के पूरे गांव ही मुस्लिम बन गए जबकि आज भी कश्मीर में मुस्लिमों के नाम ही उनके पंडित मूल को दशार्ते है। इसलिए यह कहना कि दलितों ने ही सिर्फ मुस्लिम धर्म अपनाया, गलत है। सच यह है कि सैकड़ों सालों तक भारत के अधिकतर हिन्दू यानि जिन्हें आज दलित कहा जाता है, उन स्वाभिमानी, धर्माभिमानी एवं राष्ट्राभिमानी दलितों ने मुस्लिम सत्ता के दबाव को झेलने के बावजूद अपने धर्म और संस्कृति को बचाए रखा। इसलिए आम जनता को अब यह समझना होगा कि तथाकथित दलित-मुस्लिम एकता की बात करने वाले आखिर अपने किस मंसूबों को पूरा करने की फिराक में है? साथ ही यह भी ध्यान देना होगा कि मीडिया से लेकर राजनीति में इस कथित एकता की जो लोग बात कर रहे है, वह दलित नहीं है।
वास्तव में दलित और मुस्लिम एकता के पार्श्व में भारत की कुछ कठोर वास्तविकता का उल्लेख होना आवश्यक है। दलित एवं मुस्लिम समाजों की उत्पत्ति का करक एवं कारण तथाकथित उन बुद्धिजीवियों को ज्ञात होता अथवा इन वर्गों के लोग भी इसे जानते तो राजनीति के इस प्रकार के खेल के उद्देश्य को सरलता से समझा जा सकता है। सच्चाई तो यह है कि भारत में तथाकथित दलित एवं मुस्लिम वर्ग लगभग 12 वीं सदी के पहले था ही नहीं। भारत सरकार के गजट एवं रजिस्ट्रार जनरल आफ इण्डिया के अनुसार अनुसूचित जाति की सूची में हिन्दू फोल्ड की जो जातियां शामिल होती हैं, उनके लिए दो बातें आवश्यक हैं। पहला वह जो जातियां जो अस्पृश्य हैं और दूसरा वह जातियां जो अस्वच्छ कार्यों में संलिप्त हों। इसके अलावा अन्य कोई कारण या कारक नहीं है। जहां तक अस्पृश्यता या अस्वस्थ कार्यों की बातें है, उस सन्दर्भ में मेरा दावा है कि भारत में अस्पृश्यता एवं अस्वच्छ व्यवसायों का एक भी उदाहरण 12 वीं सदी के पहले का नहीं प्राप्त है।
डॉ बी. आर. अम्बेडकर ने भी अपनी पुस्तक शूद्र कौन के पहले पेज पर स्पष्ट किया है कि भारत के दलित प्राचीन या वैदिक कालीन शूद्र नहीं है। वैसे भी शूद्र भारत में कभी भी अस्पृश्य नहीं थे, किन्तु अनुसूचित जातियों की सूची का प्रमुख आधार ही अस्पृश्यता है। इसी प्रकार देश में 12 वीं सदी से पहले मुस्लिम भी नहीं थे।
दलित और मुस्लिम वर्ग की उत्त्पति के सन्दर्भ में उल्लेख मिलता है कि विदेशी अरब के आक्रान्ता आक्रमणकारियों ने बड़ी संख्या में भारत के हिन्दुओं को अत्याचार, उत्पीड़न, हत्या, बलात्कार के उपरान्त घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया और उन्हें धर्मान्तरित करके मुसलमान बनाया। कुछ ऐसे हिन्दू थे, जिन्होंने मौत को स्वीकार किया किन्तु इस्लाम को अस्वीकार किया। कालांतर में उनके हिन्दू स्वाभिमान, धर्माभिमान एवं राष्ट्राभिमान को कुचल तथा भंग कर भारी दमन एवं दलन के उपरान्त अस्वच्छ वृत्ति में बलपूर्वक लगाकर उन्हें अस्पृश्य बनाते हुए दलित के रूप में स्थापित कर दिया। स्वाभिमान एवं धर्माभिमान को चमड़े और मैला ढोने के कार्य में लगाकर भंग किया। इस प्रकार चर्मकर्मी एवं सफाईकर्मी जातियां बनती चली गयी एवं भंग शब्द से ही भंगी शब्द की उत्पत्ति हुई। कालांतर में यही जातियां अस्वच्छ कार्यों के कारण अस्पृश्य बने एवं हिन्दू समाज से विलग यानि साथ होते हुए भी अलग-थलग पड़ गई। विदेशी अरेबियन आक्रांताओं को उन्ही की भाषा में जवाब देने के लिए कुछ स्वाभिमानी, धर्माभिमानी एवं राष्ट्राभिमानी दुर्गम स्थानों एवं जंगलों में जाकर गोरिल्ला युद्ध के लिए तत्पर हुए और उन्हें क्या, अंग्रेजों को भी जंगल में प्रवेश नहीं करने दिया, वही हिन्दू आज वनवासी या आदिवासी के रूप में पहचाने जाते हैं।
आज देश में आरक्षण इत्यादि उन्हें भीख या अनुदान नहीं, बल्कि विदेशी शासकों द्वारा बलपूर्वक उनके धन, संपत्ति, जमीन-जायदाद के साथ धर्म छीन लेने के कारण भारत सरकार द्वारा आरक्षण के रूप में मुआवजा का संसदीय प्रावधान है। इसलिए दलित-मुस्लिम गठजोड़ कर राजनितिक रोटी सेंकने वालों को सावधान होना होगा क्योंकि स्वार्थपरक इस राजनैतिक चाल से उन्हें लाभ हो या न हो, किन्तु देश की राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता को ठेस लगने के साथ ही गड़े मुर्दे उखाड़ने का खमियाजा देश को ही भुगतना पड़ सकता है। सहारनपुर की घटना को इसी सन्दर्भ में देखने की जरुरत है। यहां यह भी गौर तलब है कि जल्द ही उत्तर प्रदेश में निकाय चुनाव होने हैं और विधानसभा चुनाव में देश और समाजविरोधी तत्वों को जिस तरह की हार मिली है, वह उसे पचा नहीं पा रहे हैं। अब यही तत्व किसी भी तरह से एकजुट होकर भाजपा को हराने के लिए किसी भी स्तर पर जा सकते हैं और सहारनपुर की घटना तथा भीम आर्मी, ऐसे तत्वों के लिए नया हथियार बन कर सामने आया है।
देश में भाजपा की सरकार बनने के बाद जिस प्रकार ने मुस्लिम और ईसाई नेटवर्क को चोट पहुंची है उससे उनके देश विरोधी अजेंडे की धार लगातार कुंद होती जा रही है। उसी का नतीजा है कि एक के बाद एक करके नए-नए रूप और नए-नए तथाकथित दलित नेता पैदा होकर दलित समाज के कल्याण का दावा करते हुए, दलित समाज को भ्रमित करके, उन्हें हिंसा और सरकार के विरोध के लिए उकसा रहे हैं। इसे बहुत गंभीरता से समझने की जरुरत तो है, साथ ही ऐसे तत्वों के साथ सख्ती से पेश आने के लिए भी कदम उठाने होंगे, जो देश विरोधी अजेंडे के तहत ईसाई और कट्टर मुस्लिम नेटवर्क के मोहरे बन कर सामने आ रहे हैं।
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