- Post by आनंद राज्याध्यक्ष 2017-06-26
हिन्दू दलितों के हकों की राजनीति करनेवाले हैदराबादी बिरयानी वाले जय मीम वालों ने कितने दलितों को मुस्लिम संस्थानों में नौकरियाँ दी या कितने मुस्लिम कॉलेजों में आरक्षित सीटें दी?
इस कामयाबी के वर्णन के लिए मेरे पास सभ्य शब्द नहीं है। खैर, कामयाबी क्या है वो समझने के लिए थोड़ी पीछे की सत्यता को समझ लेते हैं।
पहले महायुद्ध के समय कम्युनिष्टों की सोच थी कि पूरे यूरोप में सत्ता उनके हाथ आएगी। वो यह सोच रहे थे कि युद्ध तो पूंजीवादी सत्ताओं के बीच का संघर्ष है, पूरा मजदूर और अन्य सर्वहारा वर्ग उनका साथ नहीं देगा और सेना के सैनिक भी, जो मूलत सर्वहारा वर्ग से ही आते थे, बगावत करेंगे और कोई सैनिक युद्ध भूमि पर नहीं जाएगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, देशभक्ति प्रथम रही, सब अपने अपने देश के लिए लड़े।
इस अस्वीकार के बाद वामियों ने और तिकड़में लड़ी जहां प्रजाओं का ब्रेनवाश धीरे धीरे करने की सोची। जहां भारत की बात है, यह बगावती मूवमेंट ने कैसा रूप लिया आप देखिये।
समाज के घटक जब अचानक आत्मसम्मान की दुहाई देकर अपना काम करने से मना कर देते हैं तो व्यवस्था डिस्टर्ब तो होती है लेकिन अगर वो काम आवश्यक हो या उसमें कमाई अच्छी हो तो काम करनेवाले का पर्याय ढूंढा जाता है। दूसरे तबके आकार वो काम संभालते हैं लेकिन पहला तबका जिसने अपना पारंपारिक काम छोड़ दिया है, नाकरा हो जाता है। वामियों की नीति यह रही कि उन्होने इनको सरकार की जिम्मेदारी बना दिया और लोकतन्त्र में संख्याबल का लाभ ले कर मतों की राजनीति करते रहे। ये समाज न घर के रहे न घाट के उनका केवल उपद्रवमूल्य रह गया। उनके व्यवसाय लील लिए मुसलमानों ने।
यहाँ खास उल्लेख करूंगा तो चर्मकार और खटिको का। चमड़ा और मांस यह दोनों व्यवसाय ऐसे हैं कि जिनके उपभोक्ता अधिकतर हिन्दू ही हैं। लेकिन चमार और खटिको की अस्मिता की बातें उठाकर वामियों ने उनको अपने व्यवसायों से परावृत्त कर दिया। दोनों व्यवसायों की सामाजिक जरूरत भी थी और इसमें अकूत कमाई भी है। ज्यादा से ज्यादा ग्राहक भी हिन्दू ही हैं। ये दोनों व्यवसायों पर और उन के हिन्दू ग्राहको से होती हजारो करोड़ों की कमाई पर असली हक हमारे हिन्दू चर्मकार और हिन्दू खटीक भाइयों का है लेकिन कम्युनिस्टों के उकसाने के कारण यह व्यवसाय उन्होने छोड़ दिये और मुसलमानो ने तुरंत लपक लिए। आज इन व्यवसायों में मुस्लिम मालिक हिंदुओं को क्या काम दे रहे हैं ? हिन्दू दलितों के हकों की राजनीति करनेवाले हैदराबादी बिरयानिवाले जय मीम वालों ने कितने दलितों को मुस्लिम आस्थापनों में नौकरियाँ दी या कितने मुस्लिम कॉलेजों में आरक्षित सीटें दी? लेकिन यह भी सार्वजनिक जानकारी है कि दलित नवबौद्ध जो उनके इशारों पर नारे लगा रहे हैं, उन्हें कुछ पूछने की न औकात रखते हैं न हिम्मत। बहन पर मुसलमान बलात्कार कर जाये तो उससे शादी करवाने की भी हनक नहीं। खैर, यह विषयांतर हो जाएगा तो मूल विषय पर चलते हैं। विषय है इनके व्यवसायहीन होने का।
यहाँ थोड़े समय के लिए संज्ञान लेंगे वामी मूवमेंट में मुस्लिम शिरकत का। सैय्यद सज्जाद जहीर भारत में कम्युनिस्ट पार्टी के सहसंस्थापक थे। ये नुरुल हसन साहब के भी मामाजी थे। सैय्यद सज्जाद जहीर ने एक वामी लेखकों का गुट ले कर काँग्रेस में पैठ की थी, जिसमें उनकी सहायता नेहरू ने की थी। गुट में ज्यादातर वामी मुसलमान थे। उनको साम्राज्यवादी इंग्लैंड की सत्ता उखाड़नी थी। काँग्रेस मूवमेंट का उन्होने इस्तेमाल किया। वैसे यह समझना चाहिए कि स्वतन्त्रता मूवमेंट का अर्थ हर किसी के लिए अलग था और साब के अलग अलग लक्ष्य भी थे।
काँग्रेस का जनसम्पर्क और प्रचार नेटवर्क तथा साहित्य, फिल्में आदि हर कलाक्षेत्र में वामियों ने जमकर समाजमानस को प्रभावित किया। वाम की खासियत यह रही है कि अराजक की स्थिति पैदा करो ताकि सत्ता पलट हो जाये। यहाँ ढेर सारे हिन्दू व्यवसायी केवल एक हीनभावना से प्रेरित हो कर अपने व्यवसाय छोडकर सरकार और समाज से अन्य आय के स्रोतों की अपेक्षा कर रहे थे जिसके लिए न वे पात्रता धराते थे और न स्रोतों की उपलब्धता थी। उनके व्यवसाय मुसलमानों ने उठाए और दलित हिन्दू केवल बाकी हिन्दू समाज के लिए उपद्रव रह गए।
मेरा आक्षेप वामियों की कार्यशैली पर है। उनके इरादे कभी नेक नहीं रहे। वंचितों के नाम से लड़ाई लड़ते हैं लेकिन कभी विधायक दृष्टिकोण नहीं होता। किस तरह से उनकी स्थिति सुधारी जा सकती है इसपर उनके पास कोई विचार नहीं। जहां इन व्यवसायों में अकूत आय है वहाँ आर्थिक और सामाजिक सुधार की असंख्य संभावनाएं थी। आज भी हिन्दू समाज के सहयोग से यह संभव है कि ये व्यवसाय करनेवाले समाज सक्षम हो, समाज में इतनी आर्थिक शक्ति धराएँ की कॉलेज, हॉस्पिटल आदि बनाएँ, सम्मान पाएँ। पूरी शक्यता आज भी है।
इंग्लैंड की वामी फैबियन सोसायटी से नेहरू भी प्रभावित थे और जिसके परिणाम भारत भुगत रहा है। पूरा शिक्षा का खाका ही इनके हवाले कर दिया वो अज्ञानता नही थी। जो समाज को युद्ध में सरकार से असहकार की योजना सोचते थे ऐसे पक्ष को समाज का मन घड़ने के लिए पूरी स्वतन्त्रता दे दी। उन्होने समाज के ही घटकों को समाज के खिलाफ, देश के भी खिलाफ खड़ा कर दिया।



