भारत के 14 वें राष्ट्रपति के चयन के लिए चुनावी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। अपनी प्रतिबद्धता के अनुरूप यानी दलित, शोषित एवं आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए काम करने वाली केंद्र की सत्तारूढ़ भाजपा नेतृत्व वाली नरेंद्र मोदी सरकार ने दलित समाज के अग्रणी अगुवाकार, समाजसेवी और भाजपा नेता रामनाथ कोविंद को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। हालांकि अपनी उपस्थिति को दर्ज कराने के लिए कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने लोकसभा के पूर्व स्पीकर मीरा कुमार को मैदान में उतारा है, पर उनकी हार को लेकर किसी को संदेह नहीं है। 
पिछले तीन साल के कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में एक नयी ऊर्जा का संचार हुआ है। एक तरफ जहां विदेशों में भारत के एक नयी शक्तिशाली छवि बनी है, वही देश के अंदर स्वतंत्रता के बाद से सिर्फ वादों पर जीने वाले दलितों, गरीबों, महिलाओं और समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों में आशा और विश्वास के साथ सरकार के लिए भरोसा जगा है। तीन वर्ष के मध्य केंद्र सरकार ने कई ऐसी योजनाएं प्रारम्भ की, जिसका मुख्य लक्ष्य दलितों, गरीबों और वंचितों का सवार्गीण विकास को मूर्त रूप देना है। और इन योजनाओं के सटीक क्रियान्वन के कारण वर्षो से विकास की राह देख रहे वंचित वर्ग को वास्तव में राहत मिलना शुरू तो हुई है, पर अभी भी बहुत कुछ किये जाने की आवश्कता है। यहां पर ध्यान देने लायक बिंदु यह भी है कि 2014 में देश की सत्ता में नेतृत्व परिवर्तन के साथ ही व्यवस्था यानी विचारधारा में भी परिवर्तन तो हुआ, पर नौकरशाही वही है, जिसमें परिवर्तन की प्रक्रिया बहुत धीमी गति से चल रही है। दलित, गरीब और वंचित वर्ग से जुड़ी योजनाओं के प्रभावी और सटीक क्रियान्वन के लिए यह आवश्यक है कि देश के उच्च नेतृत्व में दलित प्रतिनिधि की सहभागिता हो। ऐसे में रामनाथ कोविंद का राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने का निर्णय लेकर भाजपा ने दलित और वंचित समाज को अपनी नैतिक उतरदायित्वों का स्पष्ट सन्देश दिया है। 
राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद का चयन होना, देश और देश के दलित समाज के सर्वांगीण विकास के लिए एक और महत्वपूर्ण कदम कहा जा सकता है। भाजपा में दलित समाज के वरिष्ठ प्रतिनिधि के रूप में श्री कोविंद की अपनी एक विशेष छवि है और दो बार यानी बारह वर्षो तक राज्यसभा सांसद रहने के कारण उनकी, राजनीति और विधायी कार्यों में विशेष पकड़ है। भाजपा के अनुसूचित जाति मोर्चा के तीन बार राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके श्री कोविंद ने अपने काम से देश भर में अपनी विशेष पहचान बनायी है। सुप्रीम कोर्ट में कई वर्षो तक वकालत करने की वजह से उन्हें कानूनी मसलों पर भी महारथ हासिल है। यही वजह है कि भाजपा के कई नेताओं के नाम मीडिया द्वारा पिछले कई महीनों से राष्ट्रपति पद के लिए उछाले जा रहे थे, पर पार्टी ने शिक्षा, राजनीति और सामाजिक अनुभव को आधार बनाकर श्री कोविंद के नाम पर अपनी मोहर लगा दी। 
विपक्षी दल के नेता चाहे कितने भी प्रश्न क्यों न कर रहे हों, पर श्री कोविंद को करीब से जानने वाले उन सभी सवालों को खारिज कर देते हैं। कारण यह है कि पिछले चार दशक से अधिक समाज से सामाजिक जीवन में सक्रिय श्री कोविंद की छवि, मृदुभाषी, संवेदनशील, सामान्य जन की परेशानियों को अधिकतम आभास करने वाले, सबके साथ मिलकर काम करने की सोच और दलित विषयक समस्या के हर पहलुओं की बारीक एवं गंभीर समझ रखने वाले व्यक्तित्व के रूप में है। 
बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी श्री कोविंद से मेरी पहली मुलाकात 1994 में हुयी थी। यह वह दौर था जब मेरे बड़े भाई राजनाथ सोनकर शास्त्री लोकसभा सदस्य थे। 1994 में एक बार जब मैं दिल्ली आया तो दलित समाज के जान प्रतिनिधियों से मिलने की उत्सुकतावश उनके आवास पर तीन नेताओं से मिला, जिनमें रामनाथ कोविंद, संघप्रिय गौतम और बंगारू लक्ष्मण शामिल थे। मुलाकात के दौरान बंगारू जी ने अपनत्व का अहसास कराया, तो संघ प्रिय गौतम ने अम्बेडकर शिक्षा पर चलने के लिए प्रेरित किया। लेकिन श्री रामनाथ कोविंद जी से हुई एक सामान्य भेटवार्ता में उनका स्नेहशील स्पर्श और मेरे विचारों का स्वागत करने के साथ ही दलित विषयक समस्या पर चिंतन के लिए उनकी और से मिला मनोबल, मेरे अंतर्मन में स्पष्ट रूप से आज भी महसूस होता है। एक बड़े भाई के रूप में उनसे मिलने वाला स्नेह एक प्रेरणा के रूप से हर समय साथ रहा है। 
श्री रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी को लेकर विपक्ष सकते में है। कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहे विपक्षी दल शायद यह भूल गए हैं कि यह कांग्रेस ही है, जिसने स्वतंत्रता मिलने के बाद से ही दलितों के साथ हमेशा धोखा किया। दलित कल्याण और दलित विकास के नाम पर राजनीति और बातें तो की गई, लेकिन दलितों के नाम पर कांग्रेस ने हमेशा सत्ता का दांव ही खेला। श्री कोविंद के सामने राष्ट्रपति पद के लिए मीरा कुमार को सामने लाकर कांग्रेस खुद को दलितों का मसीहा साबित करने का खेल तो कर रही है, पर कांग्रेस के पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि अगर कांग्रेस को वास्तव में दलितों से प्रेम था, तो फिर दलित नेता जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनने से क्यों रोका गया ? अगर दलित उम्मीदवार के नाम पर कांग्रेस मीरा कुमार की वकालत कर रही है, तो फिर कांग्रेस ने प्रतिभा पाटिल की जगह मीरा कुमार को राष्ट्रपति क्यों नहीं बनाया था ? अगर कांग्रेस वास्तव में दलित हितैषी है तो फिर मीरा कुमार को डॉ मनमोहन सिंह की जगह प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनाया ? 
वास्तविकता तो यह है कि भाजपा जब एक योग्य, सक्षम और सर्वमान्य दलित नेता को देश का नेतृत्व करने के लिए आगे लेकर आयी तो यह कांग्रेस को समझ नहीं आया और मीरा कुमार को सामने खड़ा करके कांग्रेस ने एक बार फिर अपनी उसी दूषित मानसिकता का परिचय दिया है, जिस मानसिकता की वजह से कांग्रेस ने हमेशा दलितों का उपयोग किया। देश में राष्ट्रपति पद के लिए होने जा रहे चुनाव में भाजपा ने अपना एक योग्य उम्मीदवार दिया है। लेकिन विपक्ष ने इसे दलित उम्मीदवार के रूप में बदलकर राष्ट्रपति चुनाव को दलित राष्ट्रपति का चुनाव बना दिया है। यह कांग्रेस सहित विपक्ष के तमाम दलों की आखिरी भूल कही जा सकती है, जो कांग्रेस और अन्य विरोधी दलों के लिए विनाशकारी साबित होगी। दुनिया जानती है कि देश में पहले भी दलित समाज से राष्ट्रपति बने हैं, लेकिन पहली बार भाजपा ने अगर दलित समाज के योग्य व्यक्ति को उम्मीदवार बनाया हैं, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं माना जा सकता है। 
भाजपा द्वारा दलित वर्ग से राष्ट्रपति के लिए उम्मीदवार घोषित करने के निर्णय को दलित समस्या की आवश्कता की दृष्टि से भी देखने की जरुरत है। आधुनिक भारत में अभी भी दलितों को सामाजिक भेदभाव से मुक्ति नहीं मिली है। दलित अगर शिक्षित है, तो उसे शिक्षित दलित, डॉक्टर या इंजीनियर है तो दलित डॉक्टर-इंजीनियर, व्यवसायी है तो उसे दलित व्यवसायी या फिर पैसे वाला दलित ही कहा जाता है। लोकसभा या राज्यसभा सांसद हो तो उसे दलित सांसद या फिर विधायक-पार्षद होने पर दलित विधायक-पार्षद की दृष्टि से देखा जाता है। क्या यह विकास की निगाह से देखा जाता है या फिर सामाजिक चिंतन की दृष्टि से? ऐसे में दलित राष्ट्रपति की चर्चा से सवाल यह भी पैदा होता है कि क्या राष्ट्रपति भी दलित होता है? इसलिए यह बेहतर होगा कि राष्ट्रपति या राष्ट्रपति चुनाव को दलित न साबित किया जाए और इस तरह की संकुचित मानसिकता से बाहर निकला जाए। पर कांग्रेस और विपक्षी दल इस मानसिकता से खुद को बाहर नहीं निकाल पा रहे हैं। 
वैसे भी भारत में राष्ट्रपति गणतंत्र का गौरव माना जाता है। ब्रिटिश संसदीय लोकतंत्र के दौरान यह पद एक नए प्रयोग के रूप में देखा जाता रहा। व्यावहारिक रूप से यह पद लोकतंत्र में ‘अलंकारिक’ माना जाता है। इस सम्बन्ध में सविधान निमार्ता डॉ. भीम राव अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था, ‘संविधान के प्रारूप में राष्ट्रपति की वही स्थिति है जो ब्रिटिश संविधान में राजा की। वह राज्य का प्रधान है, शासन का नहीं, लेकिन विधिक दृष्टिकोण से वह अत्यंत शक्तिशाली है। ब्रिटिश संविधान वर्षों पुरानी लोकतांत्रिक परंपराओं पर आधारित है, पर भारतीय संविधान तो लिखित है जहां लोकतांत्रिक परंपराओं को जन्म लेना है। इसका कारण मूल-संविधान का अनुच्छेद 74(1) था जिसमें राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के संबंध परिभाषित हैं जिसके अनुसार, ‘प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद होगी जो राष्ट्रपति को उनके कार्यों के निष्पादन में सहायता और परामर्श देगी।’ 
फिलहाल भारतीय संविधान राष्ट्रपति को व्यवस्थापन, कार्यपालन, न्यायपालन, वित्त-आयोग, चुनाव-आयोग, सेना, वित्त-संबंधी और आपातकालीन शक्तियां देता है। यह शक्तियां काफी व्यापक हैं और आपात स्थिति में राष्ट्रपति, संसद को भंग कर सकता है, प्रधानमंत्री को बर्खास्त कर सकता है और सेना के प्रमुख कमांडर के रूप में किसी भी आंतरिक अशांति या विद्रोह से निपटने की शक्ति रखता है। इसे ध्यान में रखकर डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए हमें जॉन स्टुअर्ट मिल की वह सीख स्मरण रखनी होगी कि ‘कोई व्यक्ति कितना भी महान क्यों न हो, हमें अपनी स्वंत्रतता उसके चरणों में अर्पित नहीं करनी चाहिए, न ही उसे ऐसी शक्तियां देनी चाहिए कि वह हमारी संस्थाओं का ह्रास कर सके।’ इतिहास साक्षी है कि कोई संविधान अपने निमार्ताओं की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं, वरन राष्ट्रपति के व्यक्तित्व, चरित्र एवं क्षमता के अनुसार चलता है। 
राष्ट्रपति पद के लिए दलित समाज के रामनाथ कोविंद का चयन करके भाजपा ने उन सभी लोगों के मुँह में ताला लगा दिया है जो पार्टी के दलित एजेंडे को लेकर सवाल करते नजर आते हैं। 
2014 के लोकसभा चुनाव में बदली हुई रणनीति और दलित-पिछड़े समाज के निर्णायक वोट बैंक को हासिल करने वाली भाजपा अपने एजेंडे में दलित और पिछड़े वर्ग की जनता को विकास की मुख्यधारा में लाने की राजनीतिक वचनबद्धता को ध्यान में रखकर जिस तरह जनकल्याण में जुटी है, उसी का नतीजा राष्ट्रपति चुनाव के लिए रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी के रूप में देखा जा सकता है। श्री कोविंद की उम्मीदवारी ने देश के दलित समाज में नए उत्साह का संचार भी किया है। देश में सिर्फ भाजपा ही एकमात्र ऐसी पार्टी है, जहां अनुसूचित जातियों के समुदायों की सबसे अधिक संख्या में विधायक हैं। इसी तरह संसद में भी पार्टी का अधिकतम दलित प्रतिनिधित्व है। ऐसे में रामनाथ कोविंद की जीत को लेकर (विपक्ष को छोड़कर ) किसी को कोई संदेह नहीं है।