देश के 14 वें राष्ट्रपति का चुनाव कांग्रेस और विपक्षी दलों की कथित एकता को तार-तार करके रख देगा ? यह सवाल कांग्रेस और विपक्षी दलों द्वारा मैदान में उतरी गयी मीरा कुमार की तय हार को देखते हुए पैदा हुआ है। 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार के गठन के बाद से ही भाजपा विरोधी दल लगातार यह बताने की कोशिश करते आ रहे है कि 2019 में होने वाले अगले  लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए पूरा विपक्ष एकजुट होकर चुनाव मैदान में उतरेगा। साथ ही बिहार विधानसभा चुनाव में मिली जीत के बाद यह संकेत भी दिया दिया जाता रहा है कि 2019 में विपक्ष के महागठबंधन का नेतृत्व बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार कर सकते हैं। 
कई महीनों से जारी इस बयानबाजी और संकेतों की पोल अब खुलने लगी है। राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव पूरे शबाब पर आ चुका है। भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए के रामनाथ कोविंद के खिलाफ कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने मीरा कुमार के नाम को आगे किया है। कोविंद बनाम मीरा कुमार की जंग को दलित बनाम दलित की लड़ाई कह कर प्रचारित किया जा रहा है। मीरा कुमार के नाम के एलान के साथ ही विपक्ष ने समर्थन की कोशिश भी तेज कर दी और सबसे पहले लालू यादव ने इसके लिए नीतीश कुमार से अपील की। उन्होंने नीतीश से कहा कि वो रामनाथ कोविंद को समर्थन दे कर ऐतिहासिक गलती न करें। दरअसल लालू ने नीतीश को उनके पुराने बयान याद दिलाए, जब नीतीश ने कहा था कि जो विपक्ष तय करेगा वो वही करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया, और गत 22 जून की बैठक से पहले ही नीतीश ने रामनाथ कोविंद को समर्थन का एलान करके कांग्रेस और विपक्ष को एक बड़ा झटका दे दिया। नितीश अपनी पूरी ताकत से कोविंद के पक्ष में खड़े हैं और विपक्षी दलों के गठबंधन में नितीश के तेवरों को लेकर हड़कंप की स्थिति बनी हुई है। लालू प्रसाद के अलावा सोनिया गाँधी सहित अन्य कई नेताओं ने नितीश को समझाने की कोशिश तो की, पर यह कोशिशें कोई खास रंग नहीं दिखा पायी। अब हालत यह है कि बिहार की राजनीति में उठा पटक शुरू हो गई, स्थिति यहां तक पहुंच गई है और लालू प्रसाद और नितीश कुमार के बीच में गठबंधन तल्खियों में बदलता दिख रहा है। मौजूदा समय में बिहार के राजनीति की जो स्थिति है, उससे यह तो स्पष्ट है कि गठबंधन अब तलवार की नोंक पर है और कभी भी गठबंधन टूट सकता है। 
रामनाथ कोविंद को अपना समर्थन देने के बाद से मुख्यमंत्री नितीश कुमार, ना केवल लालू प्रसाद बल्कि कांग्रेस के निशाने पर रहे हैं। कांग्रेसी नेता गुलाम नबी आजाद तो अब यह सार्वजनिक रूप से कहने लगे हैं कि बिहार की बेटी की हार पर सबसे पहला निर्णय नीतीश कुमार ने लिया है। जो लोग एकसिद्धांत में विश्वास करते हैं, वो एक फैसला लेते हैं, और जो लोग कई सिद्धांतों में विश्वास करते हैं, वो अलग-अलग फैसले लेते हैं। इस बयान पर भी केसी त्यागी ने वार करते हुए कहा है कि कांग्रेस स्वयं तो गांधी और नेहरु के सपने को पूरा नहीं कर पाई और हमें सलाह दे रही है, हमें दूसरी पार्टियां कृपा करके ज्ञान ना दें।
वैसे सिर्फ बिहार में ही अगर टूटता है गठबंधन तो यह उन विपक्षी दलों के लिए एक बड़ा झटका होगा जो नितीश कुमार को 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी के सामने उतारने की योजना बनाने में लगे हुए हैं। नीतीश से मात खाए विपक्ष गठबंधन के लिए मीरा कुमार की उम्मीदवारी इस लिहाज से भी बेहतर है क्योंकि वे न केवल बड़ा दलित चेहरा हैं बल्कि बिहार में बाबू जगजीवन राम की सियासी विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। विपक्ष के लिए जदयू का राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए के पाले में जाना केवल इस लिहाज से बड़ा झटका नहीं कि इससे वोटों के गणित में विपक्ष कमजोर होगा बल्कि नीतीश के कदम से 2019 के चुनाव के लिए व्यापक विपक्षी गोलबंदी पर भी गंभीर सवाल खडे़ हो गए हैं। 
अब अगर बिहार को छोड़ दिया जाये तो भी कोविंद को लेकर अन्य विपक्षी दलों में भी चिंतन की प्रक्रिया जारी हैक उत्तर प्रदेश में चुनावों में मिली करारी हार के बाद मुलायम सिंह यादव ने एक बार फिर चुप्पी साध ली है।  वही समाजवादी पार्टी में दो फाड़ साफ नजर आता है लेकिन ताकतवर खेमा अखिलेश यादव का ही है।  पारिवारिक दंगल में फंसी समाजवादी पार्टी काफी कमजोर नजर आ रही है. यही वजह है कि योगी आदित्यनाथ और उनकी सरकार पर विपक्ष का कोई दबाव नजर नहीं आ रहा है और इसका साफ असर केन्द्र की मोदी सरकार पर भी नजर आ रहा है। 
कांग्रेस और उसके सहयोगियों को देख कर ऐसा लगता है कि देश में इन दिनों 'अच्छे दिन' बीजेपी के और 'बुरे दिन' कांग्रेस के ही चल रहे हैं। देश में सबसे बुरा हाल अगर किसी राजनीतिक पार्टी का है तो वह देश की केन्द्रीय सत्ता पर सबसे ज्यादा दिन काबिज रहने वाली कांग्रेस का है। पार्टी का भविष्य किन हाथों में जाएगा समझ ही नहीं रहा। पार्टी का तमाम मुद्दों पर स्टैंड क्या है जनता को पता ही नहीं। सदन में विरोधी दल की भूमिका भी नदारद है। सोनिया गांधी लगातार बीमार चल रही हैं और राहुल गांधी कुछ ज्यादा एक्टिव नजर नहीं आते। चुनावों के दौर में वे कुछ सक्रिय तो होते हैं लेकिन हार उनकी उम्मीद बुझा सी देती है। ऐसे में कांग्रेस अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर कुछ खास करने में असहाय नजर आ रही है। कांग्रेस के लिए दुखद यह भी है कि जो वामपंथी दल राष्ट्रपति चुनाव में उसके साथ खड़े होने का दावा कर रहे हैं, तो उन्हें 
केरल को छोड़ कर पिछले तीन सालों में कोई खास खुशखबरी नहीं मिली है। केरल भी उन्हें तब मिला जब सीपीआई (एम) और लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट ने मिलकर चुनाव लड़ा। ऐसे हालात में होने जा रहे राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा उम्मीदवार रामनाथ कोविंद की जीत को रोक पाना कांग्रेस और सहयोगियों के वश में नजर नहीं आता है। साथ ही अबकी बार का राष्ट्रपति चुनाव विपक्षी दलों की उस हसरत को भी छिन्न-भिन्न करने वाला साबित होगा, जिस हसरत के तहत वह सभी अगले लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार को मिलकर गिराने के ख्वाब देखे जा रहे हैं