भारत में आज भ्रष्टाचार, आतंकवाद, कट्टरवाद, धर्मांतरण, नैतिक पतन, अशिक्षा, चरमरायी हुई स्वास्थ्य व्यवस्था, सफाई की समस्या के साथ ही अनेक संकट छाये हुए हैं। पर इन सभी से ज्यादा भयावह है- जातिवाद और लिंग भेद। कारण यह है कि यह दो मूलभूत समस्याएं ही बाकी समस्याओं को पनपने में मदद करती हैं। यह दो प्रश्न ही हमारे भूत और वर्तमान की समस्त आपदाओं का मुख्य कारण हैंक  इनको मूल से ही नष्ट नहीं किया तो हमारा उज्जवल भविष्य सिर्फ़ एक सपना बनकर रह जाएगा क्योंकि एक समृद्ध और समर्थ समाज का अस्तित्व जाति प्रथा और लिंग भेद के साथ नहीं हो सकता।

यह भी गौर किया जाना चाहिए कि जाति भेद और लिंग भेद केवल हिन्दू समाज की ही समस्याएं नहीं हैं, यह दोनों सांस्कृतिक समस्याएं हैं। लिंग भेद सदियों से वैश्विक समस्या रही है और जाति भेद दक्षिण एशिया में पनपी हुई, सभी धर्मों और समाजों को छूती हुई समस्या है। चूँकि हिन्दुत्व सबसे प्राचीन संस्कृति और सभी धर्मों का आदिस्रोत है, इसी पर व्यवस्था को भ्रष्ट करने का आक्षेप मढ़ा जाता है। यदि इन दो कुप्रथाओं को हम ढोते रहते हैं तो समाज इतना दुर्बल हो जाएगा कि विभिन्न सम्प्रदायों और फिरकों में बिखरता रहेगा जिससे देश कमजोर होगा और टूटेगा। 

अपनी कमजोरी और विकृतियों के बारे में हमने इतिहास से कोई शिक्षा नहीं ली है। वर्तमान में में भी कुछ शिक्षित और बुद्धिवादी कहे जाने वाले लोग इन दो कुप्रथाओं का समर्थन करते हैं। जन्म से ही ऊँचेपन का भाव इतना हावी है कि वह किसी समझदार को भी पागल बना देक इस वैचारिक संक्रमण से ग्रस्त कुछ लोग इन कुप्रथाओं का समर्थन करने के लिए प्राचीन शास्त्रों का हवाला देते हैं जिस में समाज व्यवस्था देनेवाली प्राचीनतम मनुस्मृति को सबसे अधिक केंद्र बनाया जाता है। वेदों को भी इस कुटिलता में फंसाया गया है।

मनुस्मृति जो सृष्टि में नीति और धर्म ( कानून) का निर्धारण करने वाला सबसे पहला ग्रंथ माना गया है, उस को घोर जाति प्रथा को बढ़ावा देने वाला भी बताया जा रहा है। स्थिति यह है कि मनुस्मृति को वैदिक संस्कृति की सबसे अधिक विवादित पुस्तकों में बताया जाता है और पूरा का पूरा दलित आन्दोलन ‘मनुवाद' के विरोध पर ही खड़ा हुआ है े

मनु जाति प्रथा के समर्थकों के नायक हैं तो दलित नेताओं ने उन्हें खलनायक के सांचे में ढाल रखा है। पिछड़े तबकों के प्रति प्यार का दिखावा कर स्वार्थ की रोटियां सेकने के लिए ही अग्निवेश और मायावती जैसे बहुत से नेताओं द्वारा मनुस्मृति जलाई जाती रही है।  अपनी विकृत भावनाओं को पूरा करने के लिए नीची जातियों पर अत्याचार करने वाले, एक सींग वाले विद्वान राक्षस के रूप में भी मनु को चित्रित किया गया है। हिन्दुत्व और वेदों को गालियां देने वाले कथित सुधारवादियों के लिए तो मनुस्मृति एक पसंदीदा साधन बन गया है। विधर्मी वायरस पीढ़ियों से हिन्दुओं के धर्मांतरण में इससे फायदा उठाते आए हैं जो आज भी जारी है। ध्यान देने वाली बात यह है कि मनु की निंदा करने वाले इन लोगों ने मनुस्मृति को कभी गंभीरता से पढ़ा ही नहीं है।

दूसरी ओर जातीय घमंड में चूर और उच्चता में अकड़े हुए कुछ लोगों के लिए मनुस्मृति एक ऐसा धार्मिक ग्रंथ है जो उन्हें एक विशिष्ट वर्ग में जन्म न लेने वाले लोगों के प्रति सही व्यवहार नहीं करने का अधिकार और अनुमति देता है। ऐसे लोग मनुस्मृति से कुछ एक गलत और भ्रष्ट श्लोकों का हवाला देकर जातिप्रथा को उचित बताते हैं पर स्वयं की अनुकूलता और स्वार्थ के लिए यह भूलते हैं कि वह जो कह रहे हैं उसे के बिलकुल विपरीत अनेक श्लोक हैं।

इन दोनों शक्तियों के बीच संघर्ष ने आज भारत में निचले स्तर की राजनीति को जन्म दिया है। भारतवर्ष पर लगातार पिछले हजार वर्षों से होते आ रहे आक्रमणों के लिए भी यही जिम्मेदार है। सदियों तक नरपिशाच,गो-हत्यारे और पापियों से यह पावन धरती शासित रही। यही अतार्किक जातिप्रथा ही १९४७ में हमारे देश के बंटवारे का प्रमुख कारण बनी।  भारत कभी विश्वगुरु और चक्रवर्ती सम्राटों का देश था े आज भी भारत में असीम क्षमता और बुद्धि धन है, फिर भी हम समृद्धि और सामर्थ्य की ओर अपने देश को नहीं ले जा पाए और निर्बल और निराधार खड़े हैं। इसका प्रमुख कारण यह मलिन जाति प्रथा हैे इसलिए मनुस्मृति की सही परिपेक्ष्य में जांच-परख अत्यंत आवश्यक हो जाती है े

मनुस्मृति को लेकर लगाये जाने वाले तीन मुख्य आक्षेप यह है कि मनु ने जन्म के आधार पर जातिप्रथा का निर्माण किया, मनु ने शूद्रों के लिए कठोर दंड का विधान किया और ऊँची जाति खासकर ब्राह्मणों के लिए विशेष प्रावधान रखे और मनु नारी का विरोधी था और उनका तिरस्कार करता था। उसने स्त्रियों के लिए पुरुषों से कम अधिकार का विधान किया।

लेकिन अगर मनुस्मृति के साक्ष्यों पर गौर किया जाये तो दुष्प्रचार का षड्यंत्र पूरी तरह उजागर हो जाता है। मनुस्मृति पर अगर ध्यान दिया तो सच कुछ और दिखाई देता है।

मनुस्मृति और जाति व्यवस्था :

मनुस्मृति उस काल की है जब जन्म से जाति व्यवस्था के विचार का भी कोई अस्तित्व नहीं था। अत: मनुस्मृति जन्मना समाज व्यवस्था का कहीं भी समर्थन नहीं करती। महर्षि मनु ने मनुष्य के गुण- कर्म और स्वभाव पर आधारित समाज व्यवस्था की रचना करके वेदों में परमात्मा द्वारा दिए गए आदेश का ही पालन किया है। इसे वर्ण व्यवस्था कहा गया है े वर्ण शब्द ‘वृञ’ धातु से बनता है, जिसका मतलब है चयन या चुनना और सामान्यत: प्रयुक्त शब्द वरण भी यही अर्थ रखता है। मनुस्मृति में वर्ण व्यवस्था को ही बताया गया है और जाति व्यवस्था को नहीं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि मनुस्मृति के प्रथम अध्याय में कहीं भी जाति या गोत्र शब्द ही नहीं है ,बल्कि वहां चार वर्णों की उत्पत्ति का वर्णन है। यदि जाति या गोत्र का इतना ही महत्त्व होता तो मनु इसका उल्लेख अवश्य करते कि कौन सी जाति ब्राह्मणों से संबंधित है, कौन सी क्षत्रियों से, कौन सी वैश्यों और शूद्रों से इस का मतलब हुआ कि स्वयं को जन्म से ब्राह्मण या उच्च जाति का मानने वालों के पास इसका कोई प्रमाण नहीं है।

मनुस्मृति (१०.६५) में कहा गया है कि ब्राह्मण शूद्र बन सकता और शूद्र ब्राह्मण हो सकता है े इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपने वर्ण बदल सकते हैं। मनुस्मृति (९.३३५ ) में कहा गया है कि शरीर और मन से शुद्ध- पवित्र रहने वाला, उत्कृष्ट लोगों के सानिध्य में रहने वाला, मधुरभाषी, अहंकार से रहित, अपने से उत्कृष्ट वर्ण वालों की सेवा करने वाला शूद्र भी उत्तम ब्रह्म जन्म और द्विज वर्ण को प्राप्त कर लेता है। मनुस्मृति के अनेक श्लोक यह भी कहते हैं कि उच्च वर्ण का व्यक्ति भी यदि श्रेष्ट कर्म नहीं करता, तो शूद्र (अशिक्षित) बन जाता है े

मनुस्मृति (२.१०३) में कहा गया है कि जो मनुष्य नित्य प्रात: और सांय ईश्वर आराधना नहीं करता उसको शूद्र समझना चाहिए। (२.१७२) जब तक व्यक्ति वेदों की शिक्षाओं में दीक्षित नहीं होता वह शूद्र के ही समान है। (४.२४५) ब्राह्मण- वर्णस्थ व्यक्ति श्रेष्ट-अति श्रेष्ट व्यक्तियों का संग करते हुए और नीच- नीचतर  व्यक्तिओं का संग छोड़कर अधिक श्रेष्ट बनता जाता है। इसके विपरीत आचरण से पतित होकर वह शूद्र बन जाता है े अत: स्पष्ट है कि ब्राह्मण उत्तम कर्म करने वाले विद्वान व्यक्ति को कहते हैं और शूद्र का अर्थ अशिक्षित व्यक्ति हैक इसका, किसी भी तरह जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है।

मनुस्मृति के अनुसार तो आज भारत में कुछ अपवादों को छोड़कर बाकी सारे लोग जो भ्रष्टाचार, जातिवाद, स्वार्थ साधना, अन्धविश्वास, विवेकहीनता, लिंग-भेद, चापलूसी, अनैतिकता इत्यादि में लिप्त हैं, वे सभी शूद्र हैं। मनुस्मृति में कहा गया है कि भले ही कोई ब्राह्मण हो, लेकिन अगर वह अभिवादन का शिष्टता से उत्तर देना नहीं जानता तो वह शूद्र (अशिक्षित व्यक्ति) ही है। इसी तरह शूद्र भले ही अशिक्षित हों तब भी उनसे कौशल और उनका विशेष ज्ञान प्राप्त किया जाना चाहिए े

मनु की वर्ण व्यवस्था जन्म से ही कोई वर्ण नहीं मानती। मनुस्मृति के अनुसार माता- पिता को बच्चों के बाल्यकाल में ही उनकी रूचि और प्रवृत्ति को पहचान कर ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य वर्ण का ज्ञान और प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए भेज देना चाहिए। कई ब्राह्मण माता झ्र पिता अपने बच्चों को ब्राह्मण ही बनाना चाहते हैं परंतु इस के लिए व्यक्ति में ब्रह्मणोचित गुण, कर्म,स्वभाव का होना अति आवश्यक है। ब्राह्मण वर्ण में जन्म लेने मात्र से या ब्राह्मणत्व का प्रशिक्षण किसी गुरुकुल में प्राप्त कर लेने से ही कोई ब्राह्मण नहीं बन जाता, जब तक कि उसकी योग्यता, ज्ञान और कर्म ब्रह्मणोचित न हों।

मनु के अनुसार मनुष्य का वास्तविक जन्म विद्या प्राप्ति के उपरांत ही होता है। जन्मत: प्रत्येक मनुष्य शूद्र या अशिक्षित है। ज्ञान और संस्कारों से स्वयं को परिष्कृत कर योग्यता हासिल कर लेने पर ही उसका दूसरा जन्म होता है और वह द्विज कहलाता है। शिक्षा प्राप्ति में असमर्थ रहने वाले शूद्र ही रह जाते हैं और यह पूर्णत: गुणवत्ता पर आधारित व्यवस्था है, इसका शारीरिक जन्म या अनुवांशिकता से कोई लेना-देना नहीं है। इसके विपरीत एक तथ्य यह भी है कि अगर कोई अपनी शिक्षा पूर्ण नहीं कर पाया तो वह दुष्ट नहीं हो जाता े उस के कृत्य यदि भले हैं तो वह अच्छा इन्सान कहा जाएगा और अगर वह शिक्षा भी पूरी कर ले तो वह भी द्विज गिना जाएगा। अत: शूद्र मात्र एक विशेषण है, किसी जाति विशेष का नाम नहींक

किसी व्यक्ति का जन्म यदि ऐसे कुल में हुआ हो, जो समाज में आर्थिक या अन्य दृष्टि से पनप न पाया हो तो उस व्यक्ति को केवल कुल के कारण पिछड़ना न पड़े और वह अपनी प्रगति से वंचित न रह जाए, इसके लिए भी महर्षि मनु ने नियम निर्धारित किए हैं े

ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र वर्ण की सैद्धांतिक अवधारणा गुणों के आधार पर है, जन्म के आधार पर नहीं। यह बात सिर्फ़ कहने के लिए ही नहीं है, प्राचीन समय में इस का व्यवहार में चलन था। जब से इस गुणों पर आधारित वैज्ञानिक व्यवस्था को हमारे दिग्भ्रमित पुरखों ने जन्म आधारित व्यवस्था में बदला है, तब से ही हम पर आफत आ पड़ी है जिस का सामना आज भी कर रहें हैं।

वर्ण परिवर्तन के कुछ उदाहरण भी है जिन्हें अनदेखा किया जाता रहा है।  ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे। परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की। ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है । इसी तरह ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे। जुआरी और हीन चरित्र के भी थे। परन्तु बाद में उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये। जिसके बाद ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन  किया। सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए। राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र हो गए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। अगर उत्तर रामायण की मिथ्या कथा के अनुसार शूद्रों के लिए तपस्या करना मना होता तो पृषध ये कैसे कर पाए? इसी प्रकार राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए और इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया। ऋषि मातंग चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने, ऋषि पुलस्त्य का पौत्र रावण अपने कर्मों से राक्षस बना,  राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस हुआ, त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे, विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्र वर्ण अपनाया। विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे परन्तु बाद उन्होंने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया, विदुर दासी पुत्र थे। तथापि वे ब्राह्मण हुए और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया। मनुस्मृति के प्रक्षिप्त श्लोकों से भी पता चलता है कि कुछ क्षत्रिय जातियां, शूद्र बन गईं।

मनु परम मानवीय थे वे जानते थे कि सभी शूद्र जानबूझ कर शिक्षा की उपेक्षा नहीं कर सकते। जो किसी भी कारण से जीवन के प्रथम पर्व में ज्ञान और शिक्षा से वंचित रह गया हो, उसे जीवन भर इसकी सजा न भुगतनी पड़े इसलिए वे समाज में शूद्रों के लिए उचित सम्मान का विधान करते हैं। उन्होंने शूद्रों के प्रति कभी अपमान सूचक शब्दों का प्रयोग नहीं किया, बल्कि मनुस्मृति में कई स्थानों पर शूद्रों के लिए अत्यंत सम्मानजनक शब्द आए हैं। मनु की दृष्टि में ज्ञान और शिक्षा के अभाव में शूद्र समाज का सबसे अबोध घटक है, जो परिस्थितिवश भटक सकता है। अत: वे समाज को उसके प्रति अधिक सहृदयता और सहानुभूति रखने को कहते हैं।

वास्तव में देखा जाये तो मनु को जन्म आधारित जातिझ्रव्यवस्था का जनक मानना निराधार है। इसके विपरीत मनु मनुष्य की पहचान में जन्म या कुल की सख्त उपेक्षा करते हैं। मनु की वर्ण व्यवस्था पूरी तरह गुणवत्ता पर टिकी हुई है। प्रत्येक मनुष्य में चारों वर्ण हैं- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। मनु ने ऐसा प्रयत्न किया है कि प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान जो सबसे सशक्त वर्ण है- जैसे किसी में ब्राह्मणत्व ज्यादा है, किसी में क्षत्रियत्व, इत्यादि का विकास हो और यह विकास पूरे समाज के विकास में सहायक हो।

आज मिलने वाली मनुस्मृति में बड़ी मात्रा में मनमाने प्रक्षेप पाए जाते हैं, जो बहुत बाद के काल में मिलाए गए। वर्तमान मनुस्मृति लगभग आधी नकली हैे सिर्फ़ मनुस्मृति ही प्रक्षिप्त नहीं है। वेदों को छोड़ कर जो अपनी अद्भुत स्वर और पाठ रक्षण पद्धतियों के कारण आज भी अपने मूल स्वरुप में है, लगभग अन्य सभी सम्प्रदायों के ग्रंथों में स्वाभाविकता से परिवर्तन, मिलावट या हटावट की जा सकती है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि मनुस्मृति जो सामाजिक व्यवस्थाओं पर सबसे प्राचीन ग्रंथ है उसमें भी अनेक परिवर्तन किए गए। यह सम्भावना अधिक इसलिए है कि मनुस्मृति सर्व साधारण के दैनिक जीवन को, पूरे समाज को और राष्ट्र की राजनीति को प्रभावित करने वाला ग्रंथ रहा है। यदि देखा जाए तो सदियों तक वह एक प्रकार से मनुष्य जाति का संविधान ही रहा है। इसलिए धूर्तों और मक्कारों के लिए मनु स्मृति में प्रक्षेप करने के बहुत सारे प्रलोभन थे।

डा. डॉ. अम्बेडकर भी प्राचीन ग्रंथों में मिलावट स्वीकार करते हैं। वे रामायण, महाभारत, गीता, पुराण और वेदों तक में भी प्रक्षेप मानते हैं। महर्षि दयानंद ने जिस समाज की रचना का सपना देखा था वह महर्षि मनु की वर्ण व्यवस्था के अनुसार ही था। उन्होंने प्रक्षिप्त हिस्सों को छोड़ कर अपने ग्रंथों में सर्वाधिक प्रमाण (५१४ श्लोक) मनुस्मृति से दिए हैं। मूल मनुस्मृति वेदों की मान्यताओं पर आधारित है, पर आज मनुस्मृति का विरोध उनके द्वारा किया जा रहा है जिन्होंने मनुस्मृति को कभी गंभीरता से पढ़ा नहीं और केवल वोट बैंक की राजनीति के चलते विरोध कर रहे हैं। सही मनुवाद जन्म आधारित जाति प्रथा को पूरी तरह नकारता है और इसका पक्ष लेने वाले के लिए कठोर दण्ड का विधान करता है। जो लोग बाकी लोगों से सभी मायनों में समान हैं, उनके लिए, सही मनुवाद ' दलित ' शब्द के प्रयोग के खिलाफ है। इसलिए सभी को मिलकर जन्म आधारित जातिवाद को समूल नष्ट कर, वास्तविक मनुवाद की गुणों पर आधारित कर्मणा वर्ण व्यवस्था को लाकर मानवता और राष्ट्र का रक्षण करने के लिए आगे आना ही होगा।