- Post by दलित आंदोलन पत्रिका 2017-07-12
देश के नए राष्ट्रपति के लिए होने वाले चुनाव में भाजपा ने वरिष्ठ एवं विद्वान राजनेता रामनाथ कोविंद जी को अपना उम्मीदवार बनाया है। आंकड़ों के समीकरणों के आधार पर देखें तो उनका देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के लिए चुना जाना तय है। इसके बाद भी कांग्रेस और उसके सहयोगी 17 दलों ने श्रद्धेय स्व. जगजीवन राम जी की बेटी मीरा कुमार जी को मैदान में उतारा है। इतना ही नहीं, कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने हमारे देश के राष्ट्रपति के लिए होने वाले चुनाव को भी ‘दलित राष्ट्रपति का चुनाव’ बना दिया। कारण केवल यह कि रामनाथ कोविंद जी जाति से दलित हैं और दलित समाज के कल्याण एवं विकास के लिए वर्षो से काम करते हुए अपनी एक विशेष स्थिति को बनाने में सफल रहे हैं। राष्ट्रपति पद के लिए कोविंद जी की उम्मीदवारी को लेकर जहां कांग्रेस और उसके सहयोगी ‘राष्ट्रपति चुनाव में भी राजनीति’ करने से बाज नहीं आ रहे हैं, वहीं मीरा कुमार जी को दलित उम्मीदवार के रूप में पेश करके कांग्रेस ने खुद को दलितों का हितैषी प्रमाणित करने के प्रयास में भी जुटी हुई है।
समान्यत: देखा जाए तो मुख्य प्रश्न यही है कि अन्ततोगत्वा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह जी ने कोविंद जी के नाम पर मुहर लगाकर देश को क्या् संदेश दिया है? और कोविंद जी की उम्मीदवारी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मास्टर स्ट्रोक का नाम क्यों दिया जा रहा है? इसका उत्तर अत्यंत ही सरल एवं स्पष्ट है। भाजपा में दलित कल्याण और दलितों के विकास का एजेंडा सबसे ऊपर है। पिछले तीन वर्षों के कार्यकाल के मध्य मोदी सरकार ने दलित कल्याण के लिए जो काम और कल्याणार्थ लगभग सौ योजनाएं लागू की हैं, उतना काम पिछले 65 वर्षों के मध्य किसी भी सरकार ने नहीं किया था। मोदी सरकार की पूर्ववर्ती कांग्रेस और विपक्ष की सरकारों ने दलित कल्याण और विकास के नाम पर, दलितों को केवल उन्हें अपनी सत्ता कायम करने के लिए उपयोग किया। लेकिन मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद दलित कल्याण और विकास के लिए जो कदम उठाये, उसके परिणाम अब भूमि पर दिखने लगे हैं और दलितों को पहली बार ऐसा लगा है कि कोई सरकार उनकी भी समस्या का समाधान करने के लिए, वास्तव में काम कर रही है।
राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद जी के नाम को घोषित करने का मतलब यह भी है कि कोविंद जी का नाम संघ के उस सामाजिक समरसता वाले एजेंडे पर भी बिल्कुल फिट बैठता है, जिस एजेंडे को लेकर मार्च 2015 में आयोजित नागपुर में प्रतिनिधि सभा की बैठक में एक ठोस रणनीति तैयार की गई थी और अगले तीन साल में देश से छूआछूत खत्म करने करने के लिए संघ ने 'एक कुआं, एक मंदिर और एक श्मशान' का नारा दिया था।
बीजेपी अनुसूचित जाति मोर्चा के कई बार राष्ट्रीरय अध्याक्ष रह चुके कोविंद जी का संगठन से तालमेल काफी अच्छां है। दिल्लीवे उच्चतम न्यायालय में वकालत करने वाले कोविंद जी भाजपा संगठन में उत्तर प्रदेश से लेकर केंद्रीय स्तर तक कई अहम पदों को संभाल चुके हैं। भाजपा सबका साथ सबका विकास की मनोभाव को केवल यथार्थ रूप ही नहीं, बल्कि इसके लिए बड़ा से बड़ा कदम भी उठाने के लिए तैयार है। विपक्ष के अनेकों दलित विरोधी आरोपों भाजपा ने का यह कोविंद जी को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में मौका देकर उन लोगों को भी जवाब दे दिया है।
फिलहाल कोविंद जी की उम्मीदवारी को लेकर कांग्रेस ने जिस तरह से मीरा कुमार जी को सामने उतारा है, उससे कांग्रेस ने एक बार फिर अपने उस चरित्र को उजागर कर दिया, जिस चरित्र के तहत उसने दलितों का वर्षों उपयोग किया था। यह तो अच्छा है कि बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू के नेता नीतीश कुमार ने कोविंद जी की उम्मीदवारी की गंभीरता को समझते हुए उन्हें अपना समर्थन देने का ऐलान कर दिया है, पर इस कारण से वह कांग्रेस और विपक्षी दलों के निशाने पर भी आ चुके हैं। बयानों के रूप में विपक्षी दलों द्वारा रोजाना नीतीश पर किये जा रहे हमलों से, विपक्षी दलों की तथाकथित एकता की पोल भी खुल कर सामने आने लगी है। ऐसे में यह तय लगता है कि राष्ट्रपति चुनाव के बाद देश की राजनीति में फिर से कोई नया परिवर्तन होगा और उसके परिणाम भाजपा के लिए सुखद ही सिद्ध होंगे।
फिलहाल राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव में रामनाथ कोविंद जी की स्थिति अत्यंत सुदृढ़ बनी हुई है। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद जहां देश के दलितों के लिए फिर से एक नयी सुबह होगी, वहीं नए राष्ट्रपति के रूप में कोविंद जी, देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की विकास यात्रा में भी अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करेंगे। देश के 14 वें राष्ट्रपति के रूप में, उनके कार्यकाल का देश को इंतजार है।



