कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सी. एस. कर्णन के समर्थन करने वाले लोगों का दायरा बढ़ता जा रहा है। भारत ही नहीं बल्कि विदेशों से भी लोग उनके समर्थन में उतर आए हैं। अमेरिका के तमाम आंबेडकरवादी संगठनों ने जस्टिस कर्णन के समर्थन में संयुक्त बयान जारी किया है। उत्तरी अमेरिका के अंबेडकरवादी संगठनों ने भारतीय न्यायपालिका में सभी सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधित्व के लिए जस्टिस कर्णन के तर्कों का समर्थन करते हुए भारतीय न्यायपालिका में आरक्षण की मांग की। इन संगठनों ने कहा कि कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति कर्णन का मामला भारतीय न्यायिक प्रणाली में भीतर तक जड़ें जमा चुके जातिगत भेदभाव को प्रदर्शित करता है। न्यायमूर्ति कर्णन द्वारा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों पर जातिगत भेदभाव का आरोप लगाना, भारतीय न्यायपालिका में जातिगत भेदभाव के पूर्वाग्रह का जीता जागता सबूत है।
अमेरिकी अंबेडकरवादी संगठनों ने पूरी तरह से अपना समर्थन कर्णन को देते हुए उन्हें अपना संघर्ष जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया। इन संगठनों ने अपने संयुक्त बयान में कहा कि, 'न्यायमूर्ति कर्णन ने भारतीय न्याय प्रणाली के उस झूठ की पोल खोल दी है जिसमें माना जाता रहा है कि भारतीय न्यायपालिका निष्पक्ष निर्णय करती है। भारतीय जाति व्यवस्था के खिलाफ न्यायमूर्ति कर्णन के रूप में हमें एक ऐसा कारण मिला है जिससे हम अंतर्राष्ट्रीय जातियों के आधार पर एक मजबूत जाति बनाने और अंतर्राष्ट्रीय सरकारों और संयुक्त राष्ट्र संघ को एक कारण दिया है।' 
संगठनों का मानना है कि इस प्रकरण ने न्यायिक व्यवस्था में जातिगत भेदभाव की छिपी हुई दुर्भावनापूर्ण प्रथा सामने लाया है। उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा जाति के न्यायाधीश के प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है या न के बराबर है। साल 1950 से आज तक केवल चार दलित न्यायाधीशों को ही सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत किया गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के न्यायालयों में आसीन लगभग 70 प्रतिशत न्यायाधीश 132 परिवारों से आते हैं जिससे देश की न्यायिक व्यवस्था उसी बने-बनाए ढर्रे पर चल रही है।