- Post by नानकचन्द 2017-11-06
उत्तर आधुनिकता के युग में भी सामाजिक असमानता और अस्पृश्यता की समस्या दलित समाज के विकास के मार्ग में एक गंभीर समस्या बनी हुई है। दलित समाज आज भी सामाजिक और आर्थिक समानता प्राप्त नहीं कर पाया है। लेकिन यह प्रमाणित होता है कि समय की माँग के अनुसार दलितों की दशा और दिशा में आमूल चूल परिवर्तन अवश्य हुआ है। केंद्र सरकार और राज्य सरकार ने दलित समाज में अभिशप्त गरीबी की समस्या के निराकरण के लिए विभिन्न सरकारी योजनाएं क्रियान्वित की हैं, लेकिन फिर भी दलित समाज सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त नहीं हो पाया है। डॉ. अंबेडकर ने दलित समाज में शिक्षा के प्रति चेतना उत्पन्न की जिससे हजारों वर्षों से शोषित दलित वर्ग अपना सामाजिक और आर्थिक विकास कर सके। लेकिन सवाल यह भी है कि दलित समाज के जनजीवन को गरीबी किस तरह प्रभावित कर रही है और वो कौन से कारक हैं कि दलित समाज एकजुट होने में नाकामयाब दिखाई पड़ता है? और क्या वर्तमान में दलित समुदाय के जनजीवन में सकारात्मक परिवर्तन हो पाया है या नहीं?
भारत एक लोकतान्त्रिक देश है जिसमें 75 प्रतिशत लोग गांवों में निवास करते हैं। आजादी के 67 वर्षों के पश्चात भी भारत में जाति अपनी जड़ जमाये हुए है। भारत दुनिया में भूखे लोगों वाले 79 देशों की सूची में 75वें नंबर पर है और गरीब देशों की सूची में 135वें नंबर पर है। ऐसा माना जाता है कि भारत का लोकतंत्र बेजोड़ है जिसकी जड़ें बेहद मजबूत हैं और यहाँ का शासन कानून-सम्मत है। लेकिन प्रश्न यह है कि आजादी के 67 वर्षों के अंतराल के पश्चात भी एक विशेष समुदाय के साथ शोषण और उत्पीड़न की घटनाएँ क्यों घटित होती हैं? यह इस देश का दुर्भाग्य है कि डॉ. अंबेडकर के द्वारा बनाए गए संविधान के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। हम 21वीं सदीं में प्रवेश कर चुके हैं लेकिन दलित समाज के साथ शोषण और उत्पीड़न की घटनाओं में निरंतर वृद्धि हो रही है, लेकिन कुछ शिक्षाविदों का वक्तव्य है कि समाज की मानसिकता में परिवर्तन अवश्य आया है। लेकिन यह बिल्कुल गलत है क्योंकि अगर परिवर्तन हुआ है तो दलित समाज की मानसिकता में परिवर्तन हुआ है। यह कहने में संकोच नहीं है कि जिस देश में इंटरनेट के युग में भी दलित वर्ग के अधिकारों का हनन किया जाता है, वहां यह कैसे कह सकते हैं कि भारतीय समाज की सोच में निरंतर परिवर्तन आ रहा है?
आजादी के ६७ वर्षों के बाद भी भारत अमेरिका की तुलना में खराब स्थिति में है आखिर क्यों? भारत को गरीब और अमेरिका को एक अमीर देश मानते हैं - जबकि दोनों का एक समान राजनैतिक ढांचा है, काम के मोर्चे पर समान उदार विचारधाराएं और मान्यताएं हैं और सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दोनों देशों में मेधावी और परिश्रमी मानव संसाधन के समृद्ध स्रोत हैं। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि ऐसा क्यों है कि भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) 500 अमेरिकी डॉलर है जबकि अमेरिका का करीब 40,000 डॉलर? कुछ समय पूर्व भारत की स्थिति भी चीन के समान ही थी। लेकिन पिछले ६७ वर्षों में इन सभी देशों ने भारत को पीछे धकेल दिया है। यह स्वीकृत करने में परेशानी नहीं होनी चाहिए कि जब भी किसी देश में किसी विशेष वर्ग को हाशिये पर रखा गया है उस देश की आर्थिक व्यवस्था उतनी ही कमजोर हुई है। ऐसा बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों और नीति निर्धारकों का मानना है कि भारत 2020 में विकसित देश बन जाएगा। आंकड़ों के अनुसार बताया जाता है कि हम 10 पर्सेंट की ग्रोथ रेट हासिल कर लेंगे और चीन को पीछे छोड़ देंगे और जिससे देश में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर दोगुनी हो जाएगी। मगर दूसरी तरफ यूएनडीपी की रिपोर्ट के अनुसार भारत में सबसे अधिक गरीब लोग रहते हैं। देश में कुल गरीबों की संख्या 42 करोड़ है, जो 26 अफ्रीकी देशों के गरीबों से एक करोड़ ज्यादा है। यूएनडीपी की ‘ूमन डिवेलपमेंट रिपोर्ट के ताजा संस्करण में कहा गया है कि भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा और राजस्थान में सबसे ज्यादा गरीबी है। उदाहरण के तौर पर 2009-10 के आधार पर 50 फीसदी कृषि मजदूर गरीबी रेखा से नीचे थे। 42 फीसदी अनुसूचित जाति और 47 फीसदी अनुसूचित जनजाति के लोग भी गरीबी रेखा से नीचे थे।
अगर विश्लेषण किया जाये तो यह सर्वविदित है कि भारत के शासन, प्रशासन, कार्मिक मंत्रालयों और विभागों पर उच्च वर्गों का ही प्रभुत्व रहा है लेकिन फिर भी हमारा देश गरीबी समस्या और जाति के अभिशाप से क्यों पीड़ित है? लेकिन इसका उत्तर सभी के पास है। अगर देश का विकास करना है तो दलित वर्ग को समानता का अधिकार देना ही होगा जिससे हजारों वर्षों से बहिष्कृत समाज देश की मुख्य धारा से जुड़कर जन कल्याण के कार्यों में अपना योगदान दे सकें। राज्य सरकार और केंद्र सरकार दलित वर्ग के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए विभिन्न सरकारी योजनाए क्रियान्वित कर रही है। लेकिन इस तरफ किसी का ध्यान नहीं है कि दलित समाज को कैसे देश की मुख्यधारा से जोड़ सकें? भारतीय राजनीतिज्ञों को सर्वप्रथम दलित समाज पर ध्यान देने की ओर जरूरत है क्योंकि इतिहास यह प्रमाणित करता है कि देश के आर्थिक विकास में दलित वर्ग ने महत्तवपूर्ण भूमिका निभाई है।
दलित वर्ग का हजारों वर्षों से दमन किया जाता रहा है चाहे वो बथानी टोला हत्याकांड हो, खैरलांजी हत्याकांड हो और चाहे मिर्चपुर हत्याकांड हो। दलित समाज के सामाजिक और आर्थिक विकास के मार्ग में विभिन्न बाधक तत्व हैं जिसके कारण दलित वर्ग पूर्ण रूप से विकास नहीं कर पाया है। दलित वर्ग के सामाजिक और आर्थिक जीवन को गरीबी, जाति क्षेत्रवाद, धर्म, भ्रष्टाचार, महंगाई, कुपोषण, अशिक्षा, जनसंख्या, प्राकृतिक आपदाय आदि मुख्य कारक प्रभावित कर रहे हैं। भूमंडलीकरण के युग में भी दलित वर्ग के विकास में गरीबी एक प्रमुख समस्या बनी हुई है। केंद्र सरकार और राज्य सरकार दलित वर्ग का विकास के लिए विभिन्न सरकारी योजनाएं क्रियान्वित कर रही हैं लेकिन दलित समाज की आर्थिक दशा में आमूल चूल परिवर्तन ही दृष्टिगोचर होता है क्योंकि दलित समाज का भूमि और उत्पादन के संसाधनों पर एकाधिकार नहीं रहा है।
भारत में वर्ष 2010 में यूपीए की सरकार के दौरान कॉमनवेल्थ घोटाला, टूजीस्केम घोटाला, कोलस्केम आदि घटनाएं दशार्ती है कि भूमंडलीकरण के युग में भी भ्रष्टाचार एक विकराल चुनौती बना हुआ है और यही कारण है कि दलित समाज आज भी हाशिये पर है। दलित वर्ग के बच्चों के लिए स्कूलों और कालेजों में छात्रवृत्तियों की व्यवस्था की गयी है लेकिन यहां पारदर्शिता के अभाव के कारण दलित समाज सरकारी सहायता पाने में भी नाकामयाब ही दिखाई पड़ता है। दलित समाज के विकास में बालश्रम भी प्रमुख समस्या निहित है। दलित समाज में आज भी आर्थिक रूप से सशक्त नहीं है। इसीलिए उनके बच्चे शिक्षा के स्थान पर मजदूरी करनी शुरू कर देते हैं। महंगाई बढ़ गई है कि दलित जीवनयापन करने में असहज दिखाई पड़ते हैं क्योंकि बहुसंख्यक दलित भूमिहीन है। देश में दलित समाज के लाखों बच्चे ऐसे हैं जो उचित व्यवस्था के अभाव में मानसिक शारीरिक शोषण का शिकार हो रहे हैं। ऐसा नहीं है कि देश में बाल अधिकारों की रक्षा से जुड़े कानून नहीं है लेकिन वे बाल अधिकारों को सुरक्षा नहीं दे पा रहे हैं क्योंकि सरकारी संस्थाएं और गैर सरकारी संस्थाएं ईमानदारी के साथ काम नहीं कर रही हैं और इस समस्या को समाप्त करने के लिए भारत के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी भागीदारी निभानी होगी। बालश्रम को समाप्त करने के लिए पूरी ईमानदारी के साथ लोगों को जागरूक करना होगा। हमें हर बच्चे को शिक्षा देने के लिए जोर देना होगा।
दलित समाज में अभिशप्त भुखमरी एवं गरीबी के लिए अशिक्षा भी एक प्रमुख कारक है। यह सत्य है कि अशिक्षा के कारण दलित वर्ग परिवार नियोजन नहीं कर सकता। जिसके आय के प्रतिकूल बच्चे होंगे वो अपने बच्चों को कैसे पढ़ाएगा और क्या खिलायेगा? सरकार को परिवार नियोजन के महत्व को जनसम्पर्क, रैली और विज्ञापनों के द्वारा समझाना चाहिए। अगर दलित समाज की आर्थिक दशा स्वस्थ नहीं होगी तो वह देश के विकास में अपना योगदान नहीं दे सकेंगे। उदाहरण के तौर पर जिस तरह महात्मा गाँधी ने आन्दोलन चलाया था कि अंग्रेजी हुकुमत हटाओ ठीक उसी तर्ज पर आन्दोलन चलाना चाहिए और इसमें ‘दलितों की गरीबी और अशिक्षा हटाओ’ का नारा बुलंद किया जाना चाहिए। गाँधीजी ने कहा था कि राजनीतिक आजादी तो मिल गई है, मगर आर्थिक आजादी नहीं मिली है। जिस तरह हमने अंग्रेजों को अपने देश से बाहर निकाला था। उसी प्रकार गरीबी और अशिक्षा को भी दूर भगाना होगा तभी एक खुशहाल देश का सपना पूरा हो सकेगा। अंबेडकर द्वारा सुझाया गया तरीका ही सबसे उपयोगी है। जरूरत इस बात की है कि सभी राजनीतिक पार्टियाँ दलित समाज को सशक्त करने के लिए दलितों की सार्वभौमिक समस्याओं को अपना मुद्दा बनाएँ, जिससे दलित समाज को देश की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके।
दलित समाज वर्तमान में भी अपने अधिकारों से वंचित है क्योंकि दलित समुदाय पूर्ण रूप से शिक्षा पर अपनी पकड़ नहीं बना पाया है। शिक्षा सर्व समाज के विकास की कुंजी है इसीलिए डॉ. अंबेडकर ने दलितों को शिक्षित बनो, संघर्ष करो और संगठित रहो का गुरुमंत्र दिया। दलित समाज गुरु मंत्र को अपनाने में नाकामयाब नजर आता है। दलितों की दशा और दिशा में परिवर्तन अवश्य हुआ है, दलित समुदाय के लोग आज उच्च पदों पर आसीन हैं। लेकिन फिर भी दलित समाज सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ है। बाबा साहेब अंबेडकर के सपने को साकार करने में दलित समाज हर क्षेत्र में पकड़ बनाने के लिए प्रयास कर रहा है। यह दुर्भाग्य है इस देश का कि आजादी के ६७ वर्षों के पश्चात भी वर्ग को शोषण और हत्याकांडों की घटनाओं से प्रतिदिन गुजरना पड़ता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि दलित समाज को सामाजिक समानता दिलाने में सभी वर्ग के लोगों को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी और भारत सरकार को भी दलित समाज के लोगों का विकास करने के लिए नई नीतियां बनानी होंगी, जिससे दलित समाज देश के विकास में ईमानदारी के साथ अपना योगदान दे सकें।



