- Post by डॉ० श्रीमती तारा सिंह 2017-11-06
भारतीय सामाजिक व्यवस्था में दलित का अभिप्राय उन लोगों से है, जिन्हें जन्म, जाति या वर्णगत भेदभाव के कारण हजारों सालों से सामाजिक न्याय और मानव अधिकारों से वंचित रहना पड़ा है। दलितों की भी हालत कोई खास अच्छी नहीं रही है, सवर्ण आज भी दलितों के साथ बैठकर खाने में या उसकी बिरादरी में शादी-ब्याह से कतराते हैं। यह विडंबना ही है, कि समस्त प्राणियों में एक ही तत्व के दर्शन करने वाला, वर्ण-व्यवस्था को गुण और कर्म के आधार पर निर्धारित करनेवाला समाज, इतना कट्टर कैसे हो गया कि निम्न वर्ण या जाति में जन्म लेने वालों को सब प्रकार के अवसरों से वंचित किया जाता रहा। हमारे देश का लम्बे अरसों तक गुलाम रहने का यह भी एक मुख्य कारण रहा है। हमारे स्वतंत्रता आन्दोलन के पुराधाओं ने भारत को इस कलंक पूर्ण प्रथा से मुक्त कराने का यथासाध्य प्रयास किया। भारत के संविधान अनुच्छेद 15 ( 2 बी ) के अंतर्गत यह प्रावधान रखा गया कि जाति के आधार पर, भारत के किसी भी नागरिक के साथ भेद-भाव नहीं किया जायगा ; लेकिन यह सब संविधान के पन्नों में सीमित रह गया। इसके बावजूद आज भी सवर्ण के कुएं से दलितों का पानी लेना मना है। दलितों की बस्तियाँ, सवर्णों से बिल्कुल अलग होती है जहां से सवर्ण गुजरने से आज भी बचने की कोशिश करता है।
इसके अलावा लम्बे समय तक, सामाजिक शोषण और दमन की शिकार रही, हरिजन और गिरिजन जातियों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के रूप में सूचिबद्ध किया गया, ताकि इनके लिए सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया जा सके। उनके प्रयासों का परिणाम कुछ-कुछ तो अब दिखने लगे हैं, लेकिन पूर्णतया अभी दूर है। सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्रों में चली मानवाधिकारों की हवा ने दलित चेतना को प्रवाहित करने में बड़ा योगदान किया है। यही कारण है कि अब दलित साहित्यकार परम्परागत काव्य-शास्त्र और सौन्दर्य-शास्त्र को अपर्याप्त मानते हुए साहित्य की नई कसौटी की खोज में जुट गये हैं। दूसरी ओर ये लोग अफ्रीका और अमेरिका की अश्वेत जातियों के साहित्य से भी प्रेरणा ले रहे हैं, जिससे दलितों का काव्य-शास्त्र केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि समाज को झकझोड़ने और जगाने के लिए भी हो। म्लेच्छ, अछूत, दास तथा न जाने और कितने शब्दों से पुकारे जाने दलितों द्वारा रचित 'दलित चेतना साहित्य' में अपने अनुभव को उच्चवर्ण के साहित्यकारों के अनुमान की तुलना में अधिक मार्मिक अभिव्यक्ति प्रदान करने में सक्षम हो रहा है, लेकिन इसे आत्मकथात्मक साहित्य ही कहा जा सकता है ।
हिंदी में 1980 के बाद दलितों द्वारा रचित अनेक आत्म-कथानक साहित्य आईं, जिनके कुछ नाम इस प्रकार हैं-मोहनदास, नैमिशराय, ओमप्रकाश, बाल्मीकि, सूरजपाल, चौहान आदि। 1999 में दलित पत्रिका का प्रकाशन हुआ, इसके बाद दलित उपन्यासों की रचना हुई। इतना ही नहीं, हिंदी साहित्य का दलित विमर्ष की दृष्टि से पुनर्पाठ भी आरम्भ हुआ, जिसके परिणाम स्वरूप, भक्ति-साहित्य को नई दृष्टि से व्याख्यापन किया गया। सरस्वती में प्रकाशित (1914 में) हीरा डोम की कविता, ’अछूत की शिकायत’ को दलित हिन्दी साहित्य की प्रथम रचना के रूप में स्वीकृति मिली ।
दलित साहित्य को आगे ले जाने में फुले और डॉ. अम्बेडकर का बहुत बड़ा हाथ रहा। सर्वप्रथम यह मराठी साहित्य के रूप में आया। उसके बाद तेलगु, कन्नड़, मलयालम और तामिल में आया। बाकी भाषाओं में 20 वीं सदी के अंतिम दो दशकों में आया, लेकिन मलयालम दलित चिंतक कंचाइल्लय्या जब तक यह घोषणा करते हैं कि कुछ ही वर्षों बाद देखना, अंग्रेजी भारत की राष्ट्रभाषा बन जायगी और हिन्दू-धर्म नष्ट हो जायगा। वेद, उपनिषद तथा गीता से प्रेरणा प्राप्त करने वाले साहित्य के स्थान पर डॉ. अम्बेडकरवादी दलित साहित्य सर्वव्यापी हो जायगा, तब वे वास्तव में दलित-विमर्ष को स्वार्थ और घृणा की राजनीति का शिकार बनाने की कोशिश करते हैं। ऐसे चिंतक दलित-साहित्य को आधुनिक विमर्ष के बजाय हिदू-विमर्ष के रूप में प्रस्तुत करते हैं। बावजूद यह सत्य है कि डॉ. अम्बेडकर का साहित्य, दलित-मुक्ति की खोज, ज्ञान की मुक्ति के रूप में करते हैं। जब भगवान बुद्ध आये तब उन्होंने ब्राह्मणवादी व्यवस्था से ज्ञान को उच्च वर्णों के शिकंजे से मुक्त कराया था। आज भी दलित इसी कार्य को करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए संविधान में इन्हें संवैधानिक शक्ति भी प्राप्त है। यद्यपि मणिपुर में शेष भारत की तरह, यहां न तो वर्ण-व्यवस्था की विकृतियाँ पहले थीं, न ही आज है। कहते हैं, मणिपुरी समाज में 13 वीं,14 वीं शदी में मणिपुर में वैष्णव धर्म का जब प्रवेश हुआ, तब यहां सर्वप्रथम --‘जाति-पाति पूछे नहीं कोय, हरि को भजे सो हरि के होय’ मानने वाले रामानंदी सम्प्रदाय आये। लगता है, मणिपुरी सम्प्रदाय को ये रामानंदी भा गये, तभी यहां वैष्णव धर्म का प्रचार हो सका। इतना ही नहीं, बंगाल के गौड़ीय सम्प्रदाय को भी यहां फलने-फूलने का मणिपुर सम्प्रदाय ने भरपूर माहौल दिया। उसके प्रचारकों ने यहां जाति-व्यवस्था चलाने का भी प्रयास किया। मगर मणिपुरी समाज अपने संस्कार में इतने प्रबल थे कि यहां जातिगत भेदभाव जड़ नहीं जमा सका। मणिपुर की तरह अरूणाचल प्रदेश, मिजोराम, मेघालय और नागालैंड में भी जाति-भेद न होने के कारण, वहां के साहित्य में दलित-विमर्ष नहीं है ।
निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि भारतीय साहित में दलित विमर्ष के व्यापक प्रचलन का मूल कारण जाति और वर्ण पर आधारित सामाजिक भेदभाव रहा है। जिस कारण बीसवीं सदी के अंत तक दलित वर्ग समाज में सर उठाकर खुद को दलित-वर्गीय कहने का भी हिम्मत नहीं उठा नहीं पाता था। लेकिन जब हिन्दू-धर्म के खोखले आदर्शों व संस्कृति को वे समझने लगे, तब इस व्यवस्था के विरुद्ध खड़े होने की हिम्मत करने लगे। आज दलित-साहित्य का उभार भारतीय समाज व्यवस्था के परिवर्तन का द्योतक ही नहीं, बल्कि एक प्रकार से सवर्ण समाज पर श्वेत-पत्र सा लगता है। यदि देखा जाय, तो दलित चेतना को इस जीवंत स्तर के तह पहुंचाने के लिए महात्मा ज्योति राव फुले ( सन 1890 एवं सावित्री वाई फुले 1831 ) जैसे समर्पित दंपति का योगदान विस्मृत नहीं किया जा सकता। इन्होंने 1848 में पहली कन्या पाठशाला खोली। 1851 में अछूतों के लिए पहली पाठशाला खोली और 1864 में विधवा विवाह सम्पन्न कराया। सावित्री वाई फुले को दलित समाज की पहली भारतीय शिक्षिका बनने का गौरव प्राप्त है। कुल मिलाकर देखा जाय, तो दलित-समाज के सभी तबके के लोगों का स्वर , मुख्य धारा से अलग रहने की छ्टपटाहट अभिव्यक्ति करता है। हम उम्मीद कर सकते हैं, कि दलित चेतना का यह संघर्ष एक दिन उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए बाध्य करेगी ।



