कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सी. एस. कर्णन को आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने छह महीने की जेल की सजा सुना दी। न्यायमूर्ति कर्णन पर न्यायालय की अवमानना के आरोप लगाए गए और भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को पद पर रहते हुए जेल भेजने का आदेश सुनाया गया। न्यायमूर्ति कर्णन ने न्यायिक क्षेत्र में होने वाले जातीय भेदभाव को मुखर रूप से उजागर किया था। साथ ही उन्होंने न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार और जतिवाद के खिलाफ प्रधानमंत्री से शिकायत भी की थी।
पर उनकी शिकायतों पर ध्यान देने की बजाय उन्हें न्यायालय की अवमानना का दोषी ठहरा दिया गया। न्यायमूर्ति कर्णन को जेल भेजने के फैसले में उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि इससे यह संदेश जाएगा कि न्यायालय की अवमानना एक अपराध है और इसके लिए दोषी को सजा होनी ही चाहिए। पद पर रहते हुए किसी न्यायाधीश को जेल भेजे जाने की घटना से पैदा हुआ सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या न्यायाधीशों के खिलाफ कार्रवाई को प्रकिया पर फिर से विचार करने की जरुरत है ? वर्त्तमान में उच्च या सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश के खिलाफ सिर्फ महाभियोग का ही प्रावधान है लेकिन यह प्रक्रिया इतनी जटिल है कि आज तक किसी भी न्यायाधीश को इस प्रक्रिया के जरिये हटाया नहीं जा सका है। महाभियोग के अलावा उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को दंडित करने के नाम पर सिर्फ एक राज्य से दूसरे राज्य ही भेजा जा सकता है।
न्यायाधीशों के संबंध में यूपीए सरकार के दौरान ‘जुडिशियल स्टैंडर्ड्स एंड अकाउंटिबिलिटी बिल-2010’ लाया गया था। इस बिल में एक ऐसी समिति के गठन का प्रावधान था जो न्यायाधीश के खिलाफ आने वाली शिकायतों को दर्ज कर उनकी जांच करती और कोई भी व्यक्ति किसी भी न्यायाधीश के दुर्व्यवहार या अक्षमताओं से संबंधित मामलों की शिकायत इस समिति से कर सकता था। इस बिल में दोषी पाए जाने वाले न्यायाधीशों के खिलाफ कार्रवाई के भी प्रावधान थे। 2012 में यह बिल लोकसभा से तो पारित हो गया लेकिन राज्यसभा में इसमें कई बदलाव किये गए। न्यायपालिका को भी इसके कई प्रावधानों पर आपत्ति थी। लिहाजा यह बिल करीब चार साल लंबित रहा और फिर 2014 में 15वीं लोकसभा के भंग होने के साथ ही रद्द हो गया। ऐसे में आज भी किसी उच्च या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए महाभियोग जैसे लगभग असंभव विकल्पों से इतर ज्यादा विकल्प मौजूद नहीं हैं। हालांकि अब एक एक नया विकल्प सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायाधीश कर्णन को जेल भेजकर भी खोल दिया है। 
न्यायपालिका के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि एक सेवारत न्यायाधीश से पहले उनका काम छीन लिया गया और फिर उन्हें छह महीने की सजा सुना दी। न्यायमूर्ति कर्णन दलित समुदाय से हैं और जल्द ही सेवानिवृत्त होने वाले हैं। न्यायमूर्ति कर्णन के प्रकरण की शुरूआत तब हुई, जब उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखकर उच्च न्यायपालिका के कुछ न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। अगर उनको ऐसा लगा था कि उच्च न्यायपालिका में कुछ लोग भ्रष्ट हैं तो उनके साहस या दुस्साहस की सराहना की जानी चाहिए थी और मामले की जांच करा ली जाती तो एक अनूठी पहल होती परन्तु ऐसा करने के स्थान पर उनका कार्य छीन लिया गया और मामला इतना पेचीदा हो गया कि आज वे सजा से बचने के लिए इधर-उधर हाथ-पैर मारने पर मजबूर हैं। 
वैसे उच्च न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का मामला नया नहीं है। 1980 के दशक में तीन न्यायाधीशों की समिति ने जस्टिस रामास्वामी के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामले को सही पाया परन्तु उन पर महाभियोग का प्रस्ताव नहीं पारित हो सका क्योंकि उस समय की सत्ताधारी पार्टी ने उत्तर-दक्षिण की राजनीति के चलते सदन का बहिष्कार किया और जस्टिस रामास्वामी महाभियोग प्रक्रिया द्वारा अपदस्थ होने से बच गए। उसके पश्चात सन 2012 में जस्टिस गांगुली के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई, पर उन्होंने महाभियोग से पहले उन्होंने त्याग पत्र दे दिया जिसके कारण अपने सेवानिवृत लाभों को लेने में कामयाब रहे। जहां तक न्यायाधीशों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों का प्रश्न है, उसमें सर्वोच्च न्यायालय का वीरास्वामी मामले में दिया गया वह फैसला भ्रष्टाचार की समस्या को और जटिल बना देता है जिसमें यह कहा गया कि किसी भी उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों में जांच सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की मंजूरी के बिना नहीं की जा सकती। 2012 में भारत के मुख्य न्यायाधीश ने केंद्रीय कानून मंत्रालय को लिखे गए एक पत्र में लिखा है कि सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के किसी भी न्यायाधीश के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच न्यायालय स्वयं करेगा और उसके पश्चात ही मामला सीबीआई को भेजा जा सकेगा। यही वजह रही कि न्यायमूर्ति सी एस कर्णन के मामले में उच्चतम न्यायालय ने उनकी शिकायतों को सकारात्मक तरीके से लेने की जगह, अपना अपमान मान लिया और उनके खिलाफ न्यायालय की अवमानना की कार्रवाई शुरू कर दी।  
न्यायमूर्ति कर्णन की न्यायाधीश के पद निर्वाहन की शक्तियां छीनने और उन्हें न्यायालय की अवमानना में छह माह की सजा देने से पूर्व यह जानना आवश्यक है कि किस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने कोलेजियम सिस्टम द्वारा न्यायाधीशों की शक्तियां संसद से छीनी। यद्यपि संविधान के अनुच्छेद-124 और 217 के तहत उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया बहुत ही स्पष्ट थी, परन्तु एसपी गुप्ता बनाम यूनियन आॅफ इंडिया, एडवोकेट आॅन रिकार्ड बनाम यूनियन आॅफ इंडिया ने इसके लिए बहस का रास्ता खोला। उसके पश्चात नौ सदस्यीय बेंच ने न्यायालय की आजादी के नाम पर कोलेजियम सिस्टम अपनाकर न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार संसद से छीन लिया। न्यायमूर्ति कर्णन के मामले में भी एक न्यायाधीश को महाभियोग के द्वारा हटाने का संसद का अधिकार भी छीन लिया। वर्तमान में हालत यह है कि उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायालय अपने अपीलीय क्षेत्र में आने वाले करोड़ों केसों को निपटाने की बजाय, जनकल्याण के नाम पर आने वाली याचिकाओं पर कार्यपालिका के कामों पर विचार करके कार्यपालिका को लगातार निर्देशित किया जा रहा है। तो क्या मान लिया जाए कि देश अब उच्चतम न्यायालय से चलेगा ? न्यायमूर्ति कर्णन के मामले को लेकर उच्चतम न्यायालय के वकील नितिन मेश्राम ने, उच्चतम न्यायालय के आदेश को असंवैधानिक बताते हुए लिखे गए अपने एक लेख में यह स्पष्ट किया है कि कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश कर्णन को दी गयी सजा जहां संसद की संप्रभु शक्ति और संघवाद के सिद्धांत पर हमला है और यह न्यायपालिका की आजादी को कम करने जैसा है।
सवाल यह भी है कि आखिर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मेमोरेंडम आॅफ प्रोसीजर की शर्तों को क्यों नहीं माना जा रहा है और विधायिका के अधिकार क्षेत्र को दिनोंदिन क्यों छीना जा रहा है ? अगर न्यायमूर्ति कर्णन का व्यवहार उचित नहीं है और उनका दिमागी मेडिकल परीक्षण की आवश्यकता समझी गई तो इसके लिए जिम्मेदार कौन और क्यों है ? संवैधानिक नियमों के अनुसार न्यायाधीश जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के विषय में केवल संसद में चर्चा हो सकती है जो व्यवहार न्यायाधीश कर्णन के साथ किया गया, संभव है कि कल किसी और न्यायाधीश के साथ भी हो सकता है। तो फिर ऐसे में कोई न्यायाधीश कैसे अपना काम कर सकता है। यह पूरे देश में स्थापित प्रक्रिया है कि आपराधिक मामले में बिना सुनवाई के और आरोपी को अपना पूरा बचाव का मौका दिए बिना सजा नहीं सुनाई जा सकती, परन्तु दुर्भाग्यवश न्यायमूर्ति कर्णन के मामले में ऐसा नहीं किया गया। ऐसे में यह कहना गलत नहीं लगता कि यह सब इसलिए किया गया क्योंकि वह दलित समुदाय से हैं। 
एक बिंदु यह भी है कि एक दलित न्यायाधीश को अनुचित रूप से जेल की सजा सुनाई गई, लेकिन सामाजिक न्याय के नाम पर विष्वविद्यालयों देश विरोधी नारे लगाने वाले वह सभी तथाकथित नेता चुप्पी साधे हुए हैं, जो दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यकों की राजनीति करते नहीं थकते। जबकि एक दलित न्यायाधीश द्वारा व्हिसिल ब्लोवर का काम करने पर, उसे कानून को अपने हाथ में लेने के नाम पर सजा दी गई है।