- Post by डॉ. बी. आर. अम्बेडकर 2017-07-12
लोकतंत्र की सफलता के लिए एक प्रमुख शर्त संवैधानिक नैतिकता का पालन है। कई लोग संविधान को लेकर काफी रोमांचित हैं, लेकिन मैं नहीं। मैं संविधान के पुनप्रार्रूपण के लिए इसे रद्द करने की माँग करने वाले लोगों के साथ जुड़ने को भी तैयार हूँं। लेकिन हम भूल गए हैं कि हमारे पास कानूनी प्रावधानोंवाला जो संविधान है, वह सिर्फ हड्डियों का ढाँचा है। इसका हाड़-मांस संवैधानिक नैतिकता में मिलेगा। इंग्लैड में इसे संविधान की परंपराएँ कहते हैं और लोगों को नियमोें का पालन करने के लिए तैयार रहना चाहिए। इस समय मेरे जेहन में जो एक या दो उदाहरण आ रहे हैं, मैं आपके सामने रखता हूँ।
आपको याद होगा कि जब अमेरिका की 13 कॉलोनियों ने बगावत की तो उनके नेता वॉशिंगटन थे। उन्हें सिर्फ नेता कहना अमेरिका जीवन पर उस समय उनके असर को कम करके बताना होगा। अमेरिकियों के लिए वॉशिंगटन भगवान् थे। यदि आप उनका जीवन और इतिहास पढ़े ंतो संविधान के बनने के बाद अमेरिका में उन्हें पहला राष्ट्रपति बनाया गया। उनका कार्यकाल पूरा होने के बाद क्या हुआ? उन्होंने दूसरी बार चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। मुझे इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि अगर वॉशिंगटन एक के बाद एक दस बार भी राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ते तो निर्विरोध जीत जाते, लेकिन उन्होंने दूसरी बार में इनकार कर दिया।
जब उनसे इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने कहा, ’मेरे प्यारे लोगों, आप उस लक्ष्य को भूल गए हैं जिसके लिए यह संविधान बनाया गया था। हमने यह संविधान बनाया, क्योंकि हमव ंशानुगत राजशाही नहीं चाहते थे और हम एक वंशानुगत राजा या तानाशाह नहीं चाहते थे। यदि इंग्लैड के राजा को छोड़ने के बाद आप इस देश में आकर साल दर साल ओर एक के बाद एक कार्यकाल में मेरी पूजा करेंगे तो आपके सिद्धांतों का क्या होगा? क्या आप दिल पर हाथ रखकर कह सकेंगे कि इंग्लैड में राजा के खिलाफ आपने बगावत करके सही किया जबकि आप उसकी जगह मुझे बिठा रहे हैं? ’उन्होंने कहा, ’यदि आपके जज्बात आपको इस बात के लिए मजबूर कर रहे हैं कि आप मुझसे अनुरोध करें कि मैं दूसरी बार खड़ा होऊँ तो इस सिद्धांत का प्रतिपादक होने के नाते मैं आपकी भावनाओं में नहीं बहूँगा। ’उन्होंने फिर भी कम-से-कम दूसरी बार उनसे चुनाव लड़ने का आग्रह किया तो उन्होंने माना, लेकिन जब तीसरी बार वे उनके पास गए तो उन्होंने इस ठुकरा दिया।
मैं आपको दूसरा उदाहरण देता हूँ। आपने विडंसन एडवर्ड आठवें के बारे में सुना होगा जिनकी धारावाहिक कहानी अब टाइम्स आॅफ इंडिया में छपी है। मैं गोलमेज सम्मेलन में गया था जहाँ बड़ा विवाद हो रहा था कि राजा को उसकी पसंद की लड़की से विवाह की अनुमति मिलनी चाहिए या नहीं। खासकर तब जबकि वह अनुलोम विवाह के लिए राजी हो, ताकि भले वह रानी न हो या क्या ब्रिटिश जनता उन्हें उनके निजी अधिकार से वंचित करके उसका परित्याग करने पर मजबूर करेगी? श्री बाल्डविन राजा की शादी के खिलाफ थे। उन्होंने कहा, ’यदि तुम मेरी नहीं सुनोगे तो तुम्हें जाना होगा।’मेरे मित्र चर्चिल एडवर्ड आठवें के दोस्त थे और उन्होंने उनका समर्थन किया। उस समय लेबर पार्टी विपक्ष में थी। उनके पास बहुमत नहीं था और मुझे अच्छी तरह से याद है कि लेबर पार्टी के सदस्यों ने सोचा कि क्यों न इस मसले को इस्तेमाल करके बाल्डविन को हराया जाए, क्योंकि कई ऐसे भी थे जो राजा के प्रति वफादारी के कारण उसका समर्थन करना चाहते थे। मुझे याद है कि दिवंगत प्रोफेसर लास्की ने ‘हेराल्ड’ में कई लेख लिखे जिनमें लेबर पार्टी की ओर से ऐसी किसी काररवाई की निंदा की गई थी। उन्होंने कहा था, ’हमारी परंपरा रही है कि हमने हमेशा इस बात पर सहमति जताई है कि राजा को प्रधानमंत्री की सलाह माननी चाहिए और यदि वह ऐसा नहीं करता तो प्रधानमंत्री को उसका निष्कासन कर देना चाहिए।’हमारी यही परंपरा रही है और बाल्डविन को ऐसे मसले पर हराने की सोचना गलत होगा जो राजा के अधिकारों को बढ़ावा देता है।
लेबर पार्टी ने उनकी सालह मानी और ऐसा कुछ नहीं किया। उन्होंने कहा कि परंपरा का पालन होना चाहिए। यदि आप इंग्लैड का इतिहास पढ़े ंतो आपको ऐसे कई उहाहरण मिल जाएँगे जिनमें किसी दल के नेताओं में अपने विरोधी दल के खिलाफ गलत करने का लालच जागा या। विरोधी दल ने ऐसा मसला उठाना चाहा जिससे उन्हें अस्थायी सत्ता जाए। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि उन्हें पता था कि ऐसा करके वे संविधान और लोकतंत्र को हानि पहुँचाएँगे।
लोकतंत्र की सफलता के लिए एक और बात जरूरी है और वह यह कि लोकतंत्र के नाम पर बहुमत को अल्पमत का दमन करने का अधिकार न मिल जाए। अल्पमत वाले हमेशा सुरक्षित महसूस करें कि भले ही सरकार बहुमत की है, लेकिन अल्पमत के अधिकारों का हनन नहीं होगा। हाउस आॅफ कॉमंस में इसका बड़ा सम्मान किया जाता है। आपमें से कइयों को 1931 में इंग्लैड में हुए चुनावों के नतीजे पता होंगे जब श्री रामसे मैकडोनाल्ड ने लेबर पार्टी छोड़कर राष्ट्रीय सरकार बनाई थी। जब चुनाव आए तब लेबर पार्टी के 650 में से सिर्फ 50 सदस्य थ। उस समय मैं वहीं था लेकिन मैंन एक भी ऐसी घटना नहीं सुनी जब लेबर पार्टी के 50 सदस्यों में से किसी को बहुमत में आए कंजरवेटिवज् ने अभिव्यक्ति के, विरोध करने के या प्रस्ताव लाने के अधिकार से रोका हो।
हमारी अपनी संसद् को लीजिए। मैं विपक्षी संदस्यों द्वारा बार-बार कार्य स्थगत या निंदा प्रस्ताव लाए जाने को सही नहीं ठहरा रहा हूँ। संसद्् में बार-बार इस तरह के प्रस्ताव लाना कामकाज के लिए अच्छा नहीं है। लेकिन आपने यह भी देखा होगा कि कार्य स्थगन या निंदा में से कोई भी प्रस्ताव शायद ही बहस में शामिल किया जाता है। मैं इससे हैरान रह जाता हूँ। इंग्लैड की संसदीय बहस का अध्ययन करते हुए मैंने शायद ही कभी ऐसा मामला देखा जब स्थगन की कोई माँग स्पीकर ने खारिज की हो, जब यह कि सरकार का फैसला न हो। जब मैं मुंबई विधान परिषद् का सदस्य था तब मेरे कुछ दोस्त श्री मोरारजी, श्री मुशी, श्री खेर और अन्य जो भी सत्ता में थे, उन्होंने एक भी कार्य स्थगन प्रस्ताव को बहस में शामिल नहीं होने दिया। या तो उस समय स्पीकर रहे श्री मावलेकर ने उसे खारिज कर दिया या जैसा कि उन्होंने स्वीकार किया था कि मंत्री ने इस पर ऐतराज जताया। आपको पता ही है कि मंत्री के ऐतराज करने पर क्या होता है? जब काई मंत्री एतराज करता है तो कार्य स्थगन प्रस्ताव लानेवाले को 30 से 40 लोगों को पेश करना होता है या जो भी कोटा हो। यदि सरकार छोटे समुदाय के सदस्यों, जिनकी संख्या 4, 5 या 6 ही है, के प्रस्ताव पर बार-बार एतराज जताती है तो इन अल्पसंख्यकों को अपनी शिकायतें रखने का कभी मौका ही नहीं मिलेगा। जब क्या होगा जब ये अल्पसंख्यक संसदीय लोगों के खिलाफ दुर्भावना पाल लें या कुछ असंवैधानिक कराने पर आमादा हो जाएँ? इसलिए यह जरूरी है कि जब लोकतंत्र हो तो बहुमतवाले अल्पमतवालों का दमन न करें।
एक और बिंदु मैं रखना चाहूँगा। मुझे लगता है कि लोकतंत्र के लिए समाज में नैतिक व्यवस्था के क्रियान्वयन की जरूरत है। हमारे राजनीतिशास्त्रियों ने न जाने कैसे लोकतंत्र के इस पहलू पर कभी गौर नहीं किया। नीतिशास्त्र राजनीति से अलग है। आप भले ही राजनीति सीख जाएँ और आपको नीतिशास्त्र के बारे में कुछ भी न पता हो, क्योंकि राजनीति में नीतिशास्त्र के बिना भी काम चल सकता है।
मुझे यह बड़ा विस्मयकारी लगता है। आखिरकार लोकतंत्र में क्या होता है? लोकतंत्र में स्वतंत्र सरकार की बात की जाती है। स्वतंत्र सरकार से हमारे क्या मायने हैं? स्वतंत्र सरकार का मायने है कि सामाजिक जीवन के व्यापक पहलुओं में लोग कानून के दखल के बिना बसर कर सकते हैं और यदि कानून बनाया भी जाए तो उसे बनानेवाले उम्मीद करते हैं कि समाज में उसे कामयाब बनाने की नैतिकता होगी। लोकतंत्र के इस पहलू का सिर्फ लास्की ने जिक्र किया है। अपनी एक किताब में उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि लोकतंत्र मं नैतिक व्यवस्था का हमेशा कम करके आँका जाता है। यदि नैतिक व्यवस्था नहीं है तो लोकतंत्र खंड-खंड हो जाएगा जैसा कि इस समय हमारे देश में हो रहा है।
आखिरी बात जो मैं कहना चाहता हूँ वह यह है कि लोकतंत्र में सार्वजनिक चेतना होना जरूरी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि सभी देश मे अन्याय है, लेकिन वह बराबर नहीं है। कुछ देश ऐसे हैं जहाँ अन्याय का प्रभाव बहुत कम है और कुछ ऐसे है जहाँ यह बहुत अधिक है। कई ऐसे है जो अन्याय के बोझ तले कुचले हुए हैं।
कुछ लोग इंग्लैड में यहूदियों का उदाहरण दे सकते हैं। वे ऐसे लोग थे जिन्हें उन नाइंसाफियों का सामना करना पड़ा जो ईसाईयों ने कभी नहीं झेली। हुआ यह कि इस नाइंसाफी को मिटाने के लिए यहूदियों को अकेले संघर्ष करना पड़ा। इंग्लैड में ईसाइयों ने कभी उनकी मदद नहीं कि, बल्कि उन्हें तो यह पसंद था।
इंग्लैड में यहूदियों की मदद करनेवाला अकेला इनसान राजा था। यह भले ही असाधारण हो, लेकिन इसका कारण भी असाधारण है और वह यह है-पुराने ईसाई कानून में यह यहूदी के बच्चों के बच्चों को पिता की संपत्ति विरासत में नहीं मिलती थी, क्योंकि वे ईसाई नहीं, बल्कि यहूदी थे और राजा को देश का शेष वसीयतदार होने के कारण मृत यहूदी की संपत्ति मिल जाती थी। राजा को यह पसंद था। वह बहुत खुश था। जब यहूदी के बच्चे राजा के पास अर्जी लेकर जाते तो वह संपत्ति का छोटा सा हिस्सा उन्हें देकर बाकी खुद रख लेता था। लेकिन जैसा कि मैंने कहा कि इंग्लैड के किसी व्यक्ति ने यहूदियों की कभी मदद नहीं की और अपनी आजादी के लिए उन्हें लगातार संघर्ष करना पड़ा।
यह सार्वजनिक चेतना की बात है। सार्वजनिक चेतना जिसमें अंतरात्मा ऐसी हो जो हर गलत काम पर व्यथित हो फिर चाहे पीड़ित कोई भी हो और इसका तात्पर्य है कि हर कोई चाहे वह पीड़ित हो या नहीं, उसे मुक्ति दिलाने के लिए उसका साथ देने को तैयार है।
सबसे ताजा उदाहरण दक्षिण अफ्रीका का है। वहाँ पीड़ित भारतीय है, गोरे नहीं। फिर भी आपको वहाँ ऐस गोरे मिल जाएँगे जो इस अन्याय को खत्म करने के लिए अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहे हैं। हाल ही में मैंने पढ़ा कि बड़ी संख्या में श्वेत युवा लड़के और लड़कियाँ दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के संघर्ष में जुड़ रहे हैं। यह सार्वजनिक चेतना है। मैं आपको सदमा नहीं पहुँचाना चाहता, लेकिन कई बार मुझे लगता है कि हम कितने लापरवाह हैं।
हम दक्षिण अफ्रीका की बात कर रहे हैं। मैं खुद पर हैरान हूँ कि हम जो अलगाववाद के खिलाफ इतना बोल रहे है, क्या हमारे यहाँ हर गाँव में दक्षिण अफ्रीका नहीं है? हमें जाकर देखने की जरूरत है। हर गाँव में यहाँ एक दक्षिण अफ्रीका है और मुझे ऐसा कोई उदाहरण मुश्किल से ही मिलता है जब गैर अनुसूचित जाति के लोगों ने अनुसूचित जाति के संघर्ष के साथ दिया हो। ऐसा क्यों?
क्योंकि सार्वजनिक चेतना का अभाव है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो अन्याय झेल रहे अल्पसंख्यकों को इस अन्याय से मुक्ति दिलाने से दूसरों का साथ नहीं मिलेगा तो बगावत क मानसिकता पैदा होगी जिसे लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा हो जाएगा।
अब जैसा कि मैंने कहा और मेरा मानना भी है कि ये लोकतंत्र की रक्षा के लिए जरूरी शर्तें हैं। ये सिलसिलेवार सिद्धांत नहीं हैं जिनकी व्याख्या किसी राजनीतिशास्त्री ने की हो, बल्कि विभिन्न देशों के राजनीतिक इतिहास पढ़कर मैंने यह निष्कर्ष निकाले हैं।
अब देवियों और सज्जनों, मुझे नहीं पता कि आपने किस मकसद से मुझे न्योता दिया था। हो सकता है कि आप अपने कार्यक्रम में कुछ जोड़ना चाहते हों। मुझे उम्मीद है कि मैंने वह काम पूरा किया, लेकिन जहाँ तक मेरा सवाल है जो मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि मैंने आज शाम जिस विषय पर बोला, वह देश के लिए बहुत जरूरी है। हमने यह सोच लिया है कि हमें आजादी मिल गई हैं अंग्रेज चले गए। हमें ऐसा संविधान मिल गया जो लोकतंत्र देता है। इससे ज्यादा हमें क्या चाहिए?
हम चुपचाप नहीं बैठ सकते। मैं आपको इस आत्मसंतुष्टि के खिलाफ चेतावानी देना चाहता हूँ कि यह न सोचें कि संविधान बन जाने से काम खत्म हो गया। ऐसा नही है। अभी तो शुरूआत हो गई है।
आपको याद रखना होगा कि लोकतंत्र कोई पौधा नहीं है जो हर जगह पैदा हो जाता है। यह अमेरिका में पनपा, इंग्लैड में भी। फ्रांस में भी कुछ हद तक। आपको याद होगा कि पहले यूरोपीय युद्ध के बाद और आॅस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य के विघटन के बाद विल्सन ने अपने स्वनिर्णय के बल पर छोटे-छोटे देशों को आॅस्ट्रिया से स्वतंत्र कराया। उन सभी ने लोकतांत्रिता संविधान, लोकतांत्रिक सरकार से आरंभ किया और संविधान में मौलिक अधिकार भी दिए। उस लोकतंत्र का क्या हुआ? क्या उसके कोई अवशेष भी नजर आते हैं? सब कुछ खत्म हो गया। वे दूसरे देशों के प्रभुत्व या निगरानी में है। कोई लोकतंत्र नहीं बचा है। ताजा उदाहरण लेते हैं। सीरिया में लोकतांत्रिक सरकार बनी। कुछ साल बाद वहाँ सेना ने बगावत की और सीरिया का मुख्य कमांडर शासक बन गया एवं लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ गईं। दूसरा उदाहरण लीलिए। मिस्र में क्या हुआ? वहाँ भी 1922 से 30 साल तक लोकतांत्रिक सरकार रही। एक रात फारूक को जाना पड़ा और नजीब मिस्र का तानाशाह बन बैठा जिसने संविधान को खत्म कर दिया।
ये सारे उदाहरण हमारे सामने हैं लिहाजा हमें अपने भविष्य के बारे में काफी सावधानी बरतनी होगी। आपको सोचना होगा कि क्या हमें हमारे लोकतंत्र का सुरक्षित बनाने की राह में खड़े अवरोधों और पत्थरों को हटाने के लिए कुछ सकारात्मक कदम नहीं उठाने चाहिए?
यदि मैंने यहाँ अपनी बातों के जरिए आपकी अंतरात्मा को जगाया हो कि ये समस्याएँ हैं जिनके रहते हम चैन से सो नहीं सकते तो मैं खुद को धन्यवाद दूँगा कि मैं अपना काम कर सका। अब देवियों और सज्जनो, मैं आपको लंबे समय तक बाँधकर नहीं रखना चाहता। मैं आपका आभारी हूँ कि आपने मेरी बात ध्यान से सुनी।



