- Post by संजय दीक्षित 2017-07-12
देश के 14 वें राष्ट्रपति पद के लिए होने जा रहे चुनाव में कांग्रेस नेतृत्व वाले विपक्षी दलों ने दलित नेता जगजीवन राम की पुत्री मीरा कुमार को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। इससे पहले भाजपा और उसके नेतृत्व वाले गठबंधन एनडीए ने रामनाथ कोविंद को अपना उम्मीदवार घोषित किया था। दलित समाज से आने वाले भाजपा नेता कोविंद के नाम को दलित कार्ड के रूप में देखा जा रहा था, लेकिन मीरा कुमार के मैदान में आने के बाद राष्ट्रपति चुनाव दलित बनाम दलित हो गया है। यही वजह है कि अबकी बार के चुनाव को ‘दलित’ बनाम ‘दलित’, ‘राम’ बनाम ‘मीरा’, ‘बिहार की बेटी’ बनाम ‘यूपी के बेटे’ जैसे नाम दिए जा हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कई दिनों तक चर्चा और कयासों के दौर के बाद जब बिहार के गवर्नर रामनाथ कोविंद का नाम राष्ट्रपति चुनाव के लिए आगे किया तो इसे अगले लोकसभा चुनाव से पहले ‘मोदी का मास्टर स्ट्रोक’ माना गया। इस मास्टर स्ट्रोक से कई सियासी दिग्गज धाराशायी हो गए। काफी नानुकुर के बाद शिवसेना ने भी जहां कोविंद की उम्मीदवारी को अपना समर्थन देने का एलान कर दिया तो वहीं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार के गवर्नर को मिले सम्मान की बात कह कर इसे बिहारी अस्मिता से जोड़ दिया तो बीजेडी के नवीन पटनायक ने भी कोविंद को अपना समर्थन देने की घोषणा कर दी।
भाजपा की तरफ से रामनाथ कोविंद के नाम का ऐलान होने के बाद कांग्रेस के नेतृत्व में जुटे 17 विपक्षी दलों के मन में लड़ाई लड़ने की दुविधा नहीं थी और यहीं से शुरू हुआ, दलित बनाम दलित की लड़ाई का दौर। कोविंद के सामने मीरा कुमार का नाम तय होने के पीछे भी अपनी एक कहानी है। जानकार बताते है कि राष्ट्रपति पद लिए शुरू हुई लड़ाई के सूत्रधार कांग्रेस और बाकी विपक्षी दलों से ज्यादा आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव रहे। लालू इसलिए परेशान हुए कि बिहार में उनके सहयोग से सरकार चला रहे उनके सहयोगी नितीश कुमार, उनके साथ खड़े होने के बजाए बीजेपी के रामनाथ कोविंद के साथ हो गए। लिहाजा लालू ने बीजेपी के बजाए नीतीश को घेरने की रणनीति शुरू कर दी और फिर मीरा कुमार के नाम को लेकर सामने आये। कांग्रेस और बाकी विपक्षी दलों को भी यही लगा कि भाजपा के दलित कार्ड का जवाब दलित कार्ड से ही दिया जाना चाहिए। हालांकि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की तरफ से दलित उम्मीदवार के तौर पर मीरा कुमार के साथ ही सुशील कुमार शिंदे, प्रकाश अंबेडकर सरीखे नामों की भी चर्चा तो हुई, लेकिन लालू केवल मीरा कुमार के नाम पर अड़े रहे और फिर कथित रूप से कई राजनीतिक फायदों को ध्यान में रखकर, कांग्रेस ने मीरा कुमार के नाम को हरी झंडी दिखा दी।
मीरा कुमार का नाम घोषित करने के बाद कांग्रेस को सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि जो मायावती पहले कोविंद के नाम पर राजी हो गई थी, वह मीरा कुमार के पाले में जा खड़ी हुई। इसी तरह लालू सहित अन्य विपक्षी नेताओं को उम्मीद थी कि बिहार की बेटी मीरा कुमार का नाम घोषित होने के बाद नीतीश अपना फैसला बदल देंगे, पर वास्तव में ऐसा न होने के कारण अब बिहार की नितीश-लालू सरकार के भविष्य पर भी खतरे के बादल मडराने लगे हैं।
वैसे विपक्ष की राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार मीरा कुमार पूर्व उपप्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम की बेटी हैं और पांच बार सांसद रह चुकी हैं। बिहार उनका घर रहा है। इसीलिए लालू उन्हें बिहार की बेटी बताकर चुनावी मैदान में सक्रिय हैं। दलित समुदाय के जगजीवन राम की गिनती देश के नेता के रूप में होती है और मीरा कुमार उनकी विरासत को आगे बढ़ाती रही हैं। उनके पति मंजुल कुमार बिहार की पिछड़ी जाति से आते हैं. कुमार मंजूल जाति से ‘कोईरी’ हैं, जिनकी तादाद बिहार में काफी ज्यादा है। राष्ट्रपति चुनाव के नाम पर सक्रिय कांग्रेस और लालू यादव यह मान कर चल रहे हैं कि मीरा कुमार के नाम पर दलित के साथ-साथ कोईरी जाति को भी एक साथ साधा जा सकता है। वैसे बिहार में नीतीश कुमार ने जब लालू से अलग होकर अपना अलग रास्ता चुना था तो उस वक्त पिछड़ी जाति के ‘कोईरी-कुर्मी’ समीकरण को एक साथ लाकर उन्होंने लालू के ‘यादव कार्ड’ का विकल्प तैयार किया था। तब से लेकर अबतक नीतीश कुमार के साथ ये तबका जुड़ा रहा है।
कांग्रेस समेत 17 विपक्षी दलों द्वारा घोषित उम्मीदवार मीरा कुमार के राष्ट्रपति चुनाव में उतरने के बाद सियासी रोमांच पैदा हो गया है। इसके बावजूद मीरा कुमार की उम्मीदवारी को लेकर कांग्रेस पर ही कई सवाल उठने लगे हैं। राजनीति के जानकारों के मुताबिक अबकी बार राष्ट्रपति चुनाव में दलित कल्याण की बात करने वाली कांग्रेस ने ही मीरा कुमार के पिता जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए कई खेल खेले थे। जगजीवनराम के पुत्र सुरेश और उनकी प्रेमिका सुषमा के अंतरंग क्षणों के जो चित्र सूर्या इंडिया पत्रिका में प्रकाशित हुए थे, वह पूरा कांग्रेस का ही खेल था, जो जगजीवनराम के राजनैतिक कैरियर की असमय हत्या का कारण बना। इसी तरह अब दलितों की बात करने वाली कांग्रेस ने अपने शासन काल में दलित कल्याण के नाम पर सिर्फ वोट बैंक की राजनीति की और सत्ता के लिए दलितों का इस्तेमाल किया।
राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस और उसके सहयोगी दल भले ही मीरा कुमार को मैदान में उतार कर दलित कल्याण की बात कर रहे हो,पर सच यह भी है कि मीरा कुमार को विपक्षी दलों की तरफ से उतारना एक सांकेतिक विरोध ही है क्योंकि कांग्रेस और उसके सहयोगियों को पता है कि भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए के पास राष्ट्रपति बनाए जाने के लिए जरूरी आंकड़े मौजूद हैं और ऐसे में मीरा कुमार का जीत हासिल करना किसी भी हालत में संभव नहीं है। यही वजह है कि अगर राष्ट्रपति चुनाव में मीरा कुमार को अगर हार मिलती है, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी, क्योंकि उन्हें सिर्फ हारने के लिए ही मैदान में उतरा गया है।



